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सम्यक संकल्प

सामान्यतः संकल्प का अर्थ किसी तथ्य विशेष के सन्दर्भ में दृढ -निश्चित होकर किये जाने से है | पाली भाषा में सम्यक सङ्कप्प तथा संस्कृत में सम्यक संकल्प समानार्थी है | भगवान बुध की महान शिक्षा अष्टांगिक मार्ग तहत प्रज्ञा अर्थात प्रत्यक्ष ज्ञान अंतर्गत सम्यक संकल्प एवं सम्यक दृष्टि अत्यंत ही महत्वपूर्ण है |दोनो ही उपागम अन्तर्सम्बन्धित तथा विशेष रूप में जुडी हुई है |  सम्यक दृष्टि इस महान पथ के सम्बन्ध में नजरिया देता है जबकि सम्यक संकल्प इस मार्ग के अनुसरण सम्बन्धी कार्य-योजना बताता है| सम्यक दृष्टि से सम्यक विचार  , सम्यक विचार  से सम्यक वचन , सम्यक वचन से सम्यक कर्म , सम्यक कर्म से सम्यक संकल्प  और सम्यक संकल्प से अंततः जीवन सुखद होता है | ठीक इसके विपरीत यदि दृष्टि ही असम्यक हो तो अंततः जीवन में दुःख एवं पीड़ा की परिणति होती है

वैराग्य निमित्त संकल्प

मनुष्य की नैसर्गिक वृत्तियाँ अनगिनत इच्छाओं एवं तृष्णा का आजीवन पोषक बना रहता है | केवल पोषक ही नहीं अपितु तृष्णा का गुलाम बना रहता है | जब तक तृष्णा की प्रवृति गंभीर रहती है , मनुष्य मन और इन्द्रियों का गुलाम बना रहता है | एक इच्छा समाप्त होती नहीं की दूसरी का जन्म हो जाता है | दूसरी इच्छा की पूर्ति हुई नहीं की तीसरी उठ खड़ी होती है | सम्पूर्ण जीवन भर ईच्छा एवं  तृष्णा  का यह चक्र चलता रहता है | इच्छाओं के उद्भव के इस चक्र में इन्द्रियों को कभी पूर्ण संतुष्टि नहीं होती है | केवल क्षद्म रूप में संतुष्टि का भ्र्म होता है | अभी पूर्ण दिखने वाली तृष्णा  काल-अवधि पश्चात् फिर उठ खड़ी होती है | सम्यक संकल्प के तहत इस तृष्णा के प्रति वैराग्य या सन्यास भाव द्वारा नियंत्रण किया जाता है | वैराग्य अथवा सन्यास का अर्थ घर एवं जिम्मेदारियां छोड़कर जंगल में प्रस्थान कर जाना नहीं अपितु सांसारिक तृष्णा के प्रति वैराग्य भाव का होना है |

यहाँ पर भगवान बुद्ध एवं योगेश्वर श्री कृष्ण समान दृष्टि रखते है | भगवद गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते है – श्री भगवानुवाच—“असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।। 6.35।।

अर्थात,  श्रीभगवान् कहते हैं —  हे महबाहो ! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु, हे कुन्तीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।।

सदनीयत निमित्त संकल्प दुर्भावना अथवा बद नियत मन की गंभीर नकरात्मक प्रवृति है | मनुष्य के मन के भीतर ही सकरात्मक वृति एवं नकरात्मक वृति दोनों एक साथ अस्तित्व में रहते है | भगवान बुद्ध को परम ज्ञान अनुभव के पूर्व ध्यान के समय मन में सदभावना और दुर्भावना दोनों के ही विचार आते थे | दुर्भावना या दुसरो का अहित अथवा ईर्ष्या जैसे विचार अंततः जीवन में दुःख और संताप को जन्म देते है | जबकि सदभावना अथवा दुसरो के प्रति सदनीयत जैसे सकरात्मक विचार अंततः तृष्णा का नाश करते है तथा जीवन को बंधनों से मुक्त तथा सुखमय बनाते है | बौद्ध मतावलम्बी दुसरो के कल्याण निमित “मेत्ता-भावना”  का प्रयोग करते है |मेत्ता-भावना के तहत दुसरो के प्रति  प्रेम-करुणा का भाव अंतर्मन से पालन किया जाता है |  मेत्ता -भावना तहत सर्वप्रथम स्वयं के कल्याण को सुनिश्चित किया जाता है | तत्पश्चात दुसरो के कल्याण एवं सम्पूर्ण विश्व के कल्याण निमित प्रार्थना की जाती है | वसुधैव कुटुंबकम की मान्यता इस भावना में अन्तर्निहित है | |

अहानिकर निमित्त संकल्प

मन की  नकारात्मक वृतियों में दूसरों को किसी न किसी रूप में किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाने से होता है | जब मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य या जीव को मन , वचन या शारीरिक कर्म से कष्ट या हानि पहुंचाता है या किसी भी प्रकार से उनके दुःख या पीड़ा का कारण बनता है , तो यह कर्म उसके बुरे कर्म में स्वतः  सम्मिलित हो जाता है तथा कालवधि में उसी के अनुरूप परिणाम लेकर आता है | मनुष्य को अपने कर्मों  के प्रति विशेष सतर्कता आवश्यक है | किसी भी प्रकार का कर्म हानिकर नहीं होना चाहिए | जबकि उसके स्थान पर अहानिकर कर्म तथा उस निमित संकल्प का जीवन में स्थान होना चाहिए | ईच्छा और तृष्णा दुसरो के प्रति हानिकर प्रवृति का कारक होता है | तृष्णा का नाश होते ही हानिकर प्रवृति प्रेम , करुणा और दुसरो के कल्याण में परिणत हो जाता है जो अहानिकर निमित संकल्प है |

courtesy : google images

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