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सम्यक माइंड- फुलनेस

सम्यक माइंड- फुलनेस को पाली भाषा में ‘सम्मासति’ जबकि संस्कृत में ‘सम्यक स्मृति’ के रूप में जाना जाता है | सम्यक माइंड- फुलनेस का तात्पर्य वर्तमान के इस क्षण में अपने अंदर और बाहर के प्रत्येक पहलु पर ध्यान को बनाये रखना है | बौद्ध धर्म की महान शिक्षाओं में सम्यक माइंड- फुलनेस उसका हृदय है | सम्यक माइंड- फुलनेस सैद्धांतिक और शास्त्रीय शिक्षा भर नहीं है बल्कि यह व्यावहारिक जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करता है |सम्यक माइंड- फुलनेस न केवल दुःखों से मुक्ति दिलाता है बल्कि परम सत्य के अनुभव तक का मार्ग प्रशस्त करता है | भगवान बुद्ध को परम सत्य के अनुभव तक पहुँचने में सम्यक माइंड- फुलनेस एक प्रमुख साध्य के रूप में रहा |

सम्यक माइंड- फुलनेस एक प्रक्रिया है जिसे अभ्यास के द्वारा विकसित किया जा सकता है | इस प्रक्रिया में अभ्यास का प्रारम्भ अपनी सांसो को देखने के साथ किया जाता है | इस प्रक्रिया में वर्तमान के क्षण में जीवन को जागृत रहते हुए जिया जाता है जहां अतीत और भविष्य से मुक्ति होती है | वर्तमान के इस क्षण में कोई क्षोभ , पश्चताप , भय , विस्मृति नहीं होता | जीवन के एक -एक क्षण को बिना किसी पक्षपात , पूर्वाग्रह , लगाव , कल्पना इत्यादि से रहित होकर जीने पर बल होता है | जब कोई मनुष्य इन अशुद्धियों से मुक्त होकर किसी भी चीज़ को उसके मूल स्वरुप में देखता है तो वह स्वयं का मालिक बनता है न की उसका मन | मन इन अशुद्धियों के कारण ही चीज़ो को अवास्तविक रूप में दिखाता है और इसी के कारण मन का मनुष्य पर वर्चस्व बना रहता है | मन का यदि वर्चस्व हो तो वह मालिक बन जीवन भर दुःखों में लोत -पलोत कराता रहता है | सम्यक माइंड- फुलनेस के पालन में चार महत्वपूर्ण तत्वों – देह , वेदना , चित और धम्म की महत्ता है |

कायानुपस्सना- सम्यक माइंड- फुलनेस की प्रक्रिया इस काया अर्थात देह पर ध्यान देने के साथ का प्रारम्भ होता है | जीवन की आध्यात्मिक उपलब्धि भी इस शरीर के साथ ही जुड़ी हुई है | प्रारम्भ अपनी सांस को ही आलम्बन बनाने के साथ होता है | सांस सत्य है , कोई कल्पना नहीं | सांस वर्तमान है जहाँ न तो कोई अतीत है और न ही कोई भविष्य की वृत्तियाँ | इस कायानुपस्सना तहत सांस के पश्चात् शरीर के विभिन्न अवस्थाओं पर ध्यान दिया जाता है | चलते हुए , बैठते हुए , खाते हुए, लेटते हुए -सभी अवस्थाओं में ध्यान बनाये रखना होता है |जीवन की कोई भी शारीरिक गतिविधि होश पूर्वक होनी चाहिए न कि बेहोशी में | चलना , बोलना , खाना , पीना , देखना , झुकना , सोना – इन सभी क्रियाओं में होश साधना होता है |देह के साथ ही इसकी अनित्यता और अनाकर्षण का भी होश साधना होता है | योगी और साधक इस देह को अनित्य और सम्पूर्ण देह को इसके टुकड़े -टुकड़े में अंग -भंग ज्ञान से इसके अनाकर्षण को भी खूब साध पाते है यद्यपि सामान्य जनों को समय लगता है |

वेदनानुपस्सना
यहां वेदना का तात्पर्य मन के अंतर्गत जो विचार , संवेदना उठ रही है उस पर ध्यान देने से है | मन के पटल पर विचारों की श्रृंखला चलती रहती है | ठीक वैसे ही जैसे अनंत सागर के ऊपर अनंत , अनवरत चलने वाली लहरें | विचार के ऊपर विचार | एक विचार ख़त्म हुयी नहीं की दूसरा विचार | दूसरी खत्म हुयी नहीं की तीसरा विचार | विचारों की अंतहीन श्रृंखला | हमारा मन विचारों को मुख्यतः तीन प्रकार से अनुभव करता है -सुखद विचार , दुःखद विचार और निरपेक्ष अर्थात न सुखद न ही दुःखद विचार | विचारो के अनुभव में यह होश बनाये रखना है की किसी प्रकार के विचार में ‘मैं ‘, ‘मेरा’ की आसक्ति नहीं हो | विचार चाहे सुखद हो अथवा दुःखद बस उसे देखना है और होश बनाये रखना है | ऐसा न हो की सुखद विचार में नृत्य करने लगे और दुःखद विचार में रोने लगे | विचारों से पृथक होकर केवल देखने का अभ्यास किया जाता है जैसे नीला आकाश आने -जाने वाले बादलों को |

चित्तानुपस्सना
सामान्य ज्ञान के अंतर्गत मन को चित के रूप में जाना जाता है | यद्यपि यौगिक ज्ञान अथवा सूक्ष्म स्तर पर मन और चित समान नहीं अपितु अंतर विद्यमान है | चित की अपनी वृत्तियाँ है जिन्हे हम अशुद्धियाँ भी मानते है | चित की अशुद्धियों में राग , द्वेष , क्रोध , मोह इत्यादि प्रमुख है | यहां भी होश बनाये रखना होता है | यदि चित के अंदर क्रोध है तो यह होश रखना होता है कि क्रोध है | यदपि यह सरल कार्य नहीं है | यदि चित में किसी चीज़ के प्रति तृष्णा या राग है तो यहाँ भी होश बनाये रखना होता है कि राग है | चित यदि संशयपूर्ण अथवा विश्वासपूर्ण , विखंडित अथवा खंडित , विकेन्द्रित अथवा केंद्रित ,उत्साह अथवा अनुत्साह -जिस प्रकार का भी जिस क्षण हो साधक को होशपूर्वक देखना होता है | यहाँ भी चित की दशा से ‘मै’ , ‘मेरा’ जैसी किसी प्रकार की आसक्ति से पृथक होकर होश बनाये रखना होता है
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धम्मानुपस्सना
धम्म का यहाँ तात्पर्य दो स्वरूपों -प्रथम मानसिक संस्कारों एवं द्वितीय बौद्धिक शिक्षाओ से है | मानसिक संस्कार का कार्य मन के अंतरंग घटनाओं को रंग देने का कार्य करता है | मुख्य रूप में दस कुशल मानसिक संस्कार है यथा -श्रद्धा , अद्वेष , अलोभ ,उपेक्छा , अहिंसा इत्यादि | उसी प्रकार अकुशल मानसिक संस्कारों में मोह ,प्रमाद , अश्रद्धा इत्यादि सम्मिलित है | धम्म के द्वितीय स्वरुप में पांच बाधाएं ,पांच संकुल ,छह आंतरिक और बाह्य आधार , महाबोधि के सात कारक और महान चार आर्यसत्य समिल्लित हैं | धम्मानुपस्सना का तात्पर्य घटनाओं के चिंतन से है | सम्यक माइंड- फुलनेस के अंतर्गत धम्मानुपस्सना एक व्यापक अवधारणा युक्त है जिसमे होश एवं जागरूकता को बनाये रखना होता है |

courtesy: google images

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