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सम्यक प्रयास


मनुष्य कर्म किये बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता है | जीवन निर्वाह की यथेष्ट इच्छा उससे कर्म करने को विवश किये रहती है | किसी भी कर्म को करने निमित्त प्रयास आवश्यक आधार है | किया गया प्रयास सम्यक है अथवा असम्यक – यह कर्म और इसके प्रभाव को निश्चित करता है | कृत प्रयास यदि सम्यक है अर्थात सही प्रकार से किया गया है तो यह जीवन के दुःखों का न केवल अंत करेगा अपितु मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगा | सम्यक प्रयास , सम्यक एकाग्रता और सम्यक माइंड -फुलनेस समाधि के त्रि -रत्न माने जाते है |

सम्यक प्रयास की आध्यात्मिक कसौटी है कि मनुष्य के अंदर जो अच्छे गुण है उनका संरक्षण और संवर्धन होना चाहिए जबकि जो अनुचित गुण है उनसे मुक्त होने के लिए प्रयास होना चाहिए | आध्यात्मिक दृष्टिकोण में उचित गुण और अनुचित गुण ही मनुष्य के क्रमशः सुख और दुःख का कारण है | लालच , अहं या अहंकार , अज्ञानता -मूल अनुचित गुण है | ठीक इसके विपरीत इनके स्थान पर उदारता , प्रेम-करुणा , प्रत्यक्ष ज्ञान -महान उचित गुण माने जाते है |मनुष्य का सम्यक प्रयास यही है कि मूल अवगुणों को दूर करें तथा महान गुणों को संवर्धित करे |सम्यक प्रयास के अंतर्गत चार महत्वपूर्ण नियम सम्मिलित है जिनका पालन किया जाना अपरिहार्य है |

१. अनुचित गुणों के उद्भव से रोकने हेतु प्रयास : –गुणों या अवगुणों का उद्भव एवं संवर्धन मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है | इसके लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी है कि वह गुणों के लिया प्रयासरत है या अवगुणो के लिए | संसार की रचना द्वैत के रूप में है जहां गुण और अवगुण दोनों साथ -साथ विद्यमान है | जबकि चयन करना मनुष्य के ऊपर | यदि मनुष्य का प्रयास सम्यक हो तो अनुचित गुणों को उत्पन्न होने से पूर्व ही रोका जा सकता है |

२. उत्पन्न अनुचित गुणों को दूर करना — मनुष्य के अंदर यदि पूर्व से ही अनुचित गुण मौजूद है तो सम्यक प्रयास के तहत इन दुर्गुणों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए | यद्पि दुर्गुणों को हटा पाना आसान नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं | थोड़ी संकल्प शक्ति और अनवरत प्रयास से अनुचित गुणों से पूर्णत: मुक्ति पाई जा सकती है |

३. उचित गुणों के उद्भव हेतु प्रयास –जिस तरह अनुचित गुणों को उद्भव से पूर्व ही रोका जा सकता है ठीक उसी प्रकार उचित या सम्यक गुणों के उद्भव हेतु भी प्रयास किया जाना अनिवार्य है | मनुष्य की सम्यक अभिवृति एवं विचार उचित गुणों को न केवल आकर्षित करती है बल्कि उनके लिए आधार का भी निर्माण करती है | हमारे कर्म की दिशा इस प्रकार होनी चाहिए कि महान सम्यक गुणों का उद्भव सुनिश्चित हो सके |

4.उत्पन्न उचित गुणों का संवर्धन और विकास –मनुष्य के अंदर कई महान गुण मौजूद होते है लेकिन यदि उनपर ध्यान न दिया जाये और संवर्धित न किया जाये तो वे क्षीण हो सकते है | महान गुण दुर्लभ है , लेकिन यदि आपमें मौजूद है तो यह नियति का महान उपहार है जिन्हे संजोये जाना उतना ही महत्वपूर्ण है | यदि आपमें करुणा , प्रेम , उदारता , ज्ञान जैसे गुण प्रकृति -प्रदत है तो आप महान गुणों से अभीष्ट मनुष्य है | अतः इन गुणों का संवर्धन आपका नैतिक कर्तव्य है |

भगवान बुद्ध ने अनुचित गुणों वाली अवस्था को ” अकुशल धम्म” कहा था जिसके तहत मन के अंदर विचारों , अभिवृतियों , भावनाओ के गहरे स्तर पर अशुद्धियाँ विद्यमान होती है | ठीक इसके विपरीत उस मानसिक अवस्था को जिसके तहत मन या चित पूर्णतः अशुद्धियों से मुक्त हो जाता है “ कुशल धम्म” कहा | मुख्य रूप में पांच वैसी अशुद्धियाँ है जो कुशल धम्म में सबसे बड़ी बाधा मानी जाती है | शारीरिक तृष्णा, दुर्भावना , आलस , बेचैनी या चिंता और संदेह –इन पांच बाधाओं को ‘पंचनिवारणा’ के रूप में जाना जाता है जिन्हे सम्यक प्रयास से दूर किया जा सकता है |

courtesy: google images

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