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सम्यक दृष्टि

सामान्यतः हम किसी विषयवस्तु के सन्दर्भ में अपनी अथवा किसी की दृष्टि को लेकर बातें करते है | दृष्टि का सामान्यअर्थ किसी व्यक्ति , वस्तु ,सिद्धांत , नियम इत्यादि को लेकर देखने का नजरिया है | दृष्टि सही अर्थात सम्यक अथवा गलत अर्थात असम्यक -दोनों हो सकते है | हमारे जीवन का अस्तित्व , हमारी नियति , हमारा अतीत , हमारा वर्त्तमान, हमारा भविष्य सब कुछ –हमारी दृष्टि का ही परिणाम है | सम्यक दृष्टि और असम्यक दृष्टि दोनों बिलकुल विपरीत प्रभाव वाले है | दृष्टि अथवा देखने का नजरिया किस व्यक्ति विशेष का कैसा और क्या होगा-अत्यंत ही विशिष्ट एवं अनूठी प्रकृति का है | मनुष्य इसी प्रकृति का उत्पाद माना जाता है | मनुष्य के जन्म में पश्चात् वातावरण , परवरिश , शिक्षा संस्कार -हमारी दृष्टि का निर्माण करते है | आध्यात्मिक दृष्टिकोण इसमें पूर्वजन्मों के संचित संस्कारों को भी जोड़ देता है | इन सबका समेकित रूप ही मनुष्य की दृष्टि है जो वर्तमान और आगे की यात्रा एवं नियति का निर्धारक है | यदि दृष्टि सम्यक है तो अंत -परिणाम सुःख और इसके विपरीत दृष्टि असम्यक तो अंत -फल दुःख एवं पीड़ा है|


भगवान बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग में सम्यक दृष्टि को आधारभूत मार्ग के रूप में माना जाता है | प्रज्ञा अर्थात प्रत्यक्ष ज्ञान के तहत सम्यक दृष्टि महत्वपूर्ण अंग है | मनुष्य की वैसी दृष्टि जो अलोभ , अद्वेष और प्रज्ञा- पर आधारित है, सम्यक दृष्टि है | इसके विपरीत दृष्टि जो लोभ , द्वेष और मोह-जो बुराई के मूल तत्व है पर आधारित है, असम्यक दृष्टि है | सम्यक दृष्टि को मुख्यतः दो प्रकार – लौकिक सम्यक दृष्टि एवं अलौकिक सम्यक दृष्टि के तहत वर्गीकृत किया जाता है |

लौकिक सम्यक दृष्टि लौकिक सम्यक दृष्टि के तहत मनुष्य इसी लोक में दुःख और पीड़ा से मुक्ति प्राप्त करने हेतु प्रयास करता है | मनुष्य कुशल धर्म अर्थात जो नैतिक रूप से उचित है का पालन करता है | अधिकांश मनुष्य इस संसार के अलावा अन्य किसी लोक को नहीं मानते | वे पुनर्जन्म और पारलौकिक संकल्पना में भी विश्वास नहीं करते | लौकिक सम्यक दृष्टि सभी के लिए उपयोगी है | मनुष्य चाहे तो ज्ञान और अभ्यास से अज्ञानता एवं पूर्व के असम्यक संस्कारो के आवरण को हटा कर सम्यक दृष्टि का विकास कर सकता है | यद्द्पि पूर्व के संस्कारों को हटा पाना इतना सरल नहीं है | ये संस्कार हमारी आदतों के रूप में हमारे मन और शरीर पर हावी रहता है | जब भी हम अपनी दृष्टि को सम्यक बनाने का प्रयास करते है अंतर्मन में भयंकर संघर्ष शुरू हो जाता है | मन इन संस्कारो से बंधा होता है |चुकि इन संस्कारों के समाप्त होते ही मन का अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा -इसलिए मन विद्रोह करता है | ज्ञान और अभ्यास द्वारा मन को जीता जाता है |

अलौकिक सम्यक दृष्टि
भगवान बुद्ध परम ज्ञान के अनुभव के पूर्व अपने जन्मों को जान पाने में सफल रहे | परम ज्ञान के अनुभव में उन्होंने इस जीवन के पीछे जो वास्तविक ऊर्जा और इस लोक के बाद के अन्य लोक का सम्पूर्ण अनुभव भी प्राप्त हुआ | अलौकिक सम्यक दृष्टि केवल इस जीवन में दुःखों एवं पीड़ा से मुक्ति नहीं ही नहीं चाहता बल्कि इस लोक से भी मुक्ति प्राप्त करना चाहते है | इस लोक के जीवन -मृत्यु के चक्र से भी मुक्त होना चाहता है | इसके लिए चार महान आर्य सत्य के प्रति सम्यक दृष्टि अनिवार्य है | महान आर्य सत्य न केवल दुःख और पीड़ा से मुक्ति दिलाता है बल्कि महान अष्टांगिक मार्ग निर्वाण अर्थात जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है | जीवन और संसार का आकर्षण तथा मारा (माया) का प्रभाव मनुष्य को सुख-दुःख और जीवन -मृत्यु के खेल में उलझाए रखता है |अलौकिक सम्यक दृष्टि मनुष्य को इस कुचक्र एवं बंधन से मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त करता है|

courtesy : google images

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