You are currently viewing समास किसे कहते हैं?
samas kise kahte hai

समास किसे कहते हैं?

समास किसे कहते हैं? हिन्दी भाषा में समास का अर्थ है, संक्षेप। संस्कृत में इसे एकपदीभावः समासः’ अर्थात दो या दो से अधिक पदों के एक हो जाने को कहा जाता है। दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने एक स्वतंत्र एवं सार्थक शब्द को सामासिक शब्द कहते हैं तथा उन दो या अधिक शब्दों के संयोग को समास के नाम से जाना जाता है। सामासिक शब्द को ‘समस्त पद’ भी कहा जाता है।

समास किसे कहते हैं?

संस्कृत में कहा जाता है समसनं समासः। समास शब्द ‘सम्’ (संक्षिप्त) और ‘आस’ (कथन/शब्द) के मेल से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है, ‘संक्षिप्तीकरण’ या ‘संक्षेपीकरण’। यानि कम से कम शब्दों में पूरा अर्थ प्रकट करना ‘समास’ का उद्देश्य होता है। एक ही समस्त पद में एक से अधिक समास हो सकते हैं।

  • सभी सामासिक शब्द कम से कम दो पदों के योग से बनते हैं। ये दो पद ‘पूर्वपद’ और ‘उत्तरपद’ कहे जाते हैं।
  • ये दो या अधिक पद समास के नियमों के अधीन मिलकर एक पद में परिवर्तित हो जाते हैं।
  • सामासिक शब्द या समस्त पदों के मध्य संधि होने की स्थिति में संधि भी अवश्य होती है। कभी-कभी यह नियम विदेशी शब्दों पर मान्य नहीं होते। किन्तु संस्कृत तत्सम शब्दों के लिए संधि की स्थिति होने पर संधि अवश्य होती है।
  • समास में शब्दों के प्रत्यय समाप्त कर दिये जाते हैं।

समास हो जाने पर समास बनाने वाले पदों की अपनी-अपनी विभक्तियाँ समाप्त (लुप्त) हो जाती हैं। समास बन जाने के पश्चात वह एक नया शब्द बन जाता है एवं उस शब्द की अपनी नई विभक्ति आती है। ऐसी स्थिति में सामासिक शब्द एक पद के रूप में कार्य करता है।

समास का उदाहरण-गंगा का जल=गंगाजल। यहाँ दो पदों के मिलने से एक नया पद ‘गंगाजल’ का निर्माण हुआ है। समास बनाने की इस प्रक्रिया में ‘का’ विभक्ति का लोप हो गया है।

समास-विग्रह क्या होता है?

सामासिक शब्दों के बीच के सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए समस्त पद के पदों को अलग-अलग करना समास-विग्रह कहलाता है। जैसे-‘पीताम्बर’ में ‘पीत’ पूर्वपद है और ‘अंबर’ उत्तरपद। इसका समास-विग्रह होगा-पीत है जो अंबर या पीत (पीला) है जिसका अंबर। 

एक अन्य उदाहरण है-‘राजपुत्र’-जिसका समास-विग्रह होगा-राजा का पुत्र। यहाँ समस्त पदों के बीच के संबंध को ‘का’ विभक्ति के द्वारा बोध कराया गया है।

समास के कितने भेद होते हैं?

संस्कृत व्याकरण से ही हिन्दी व्याकरण में समास आए हैं। हिन्दी में समास के छह भेद किए गए हैं-

  1. अव्ययीभाव समास
  2. तत्पुरुष समास
  3. कर्मधारय समास
  4. द्विगु समास
  5. बहुव्रीहि समास एवं
  6. द्वंद समास

संस्कृत व्याकरण में कर्मधारय समास को तत्पुरुष समास का ही भेद माना जाता है। द्विगु समास को भी कर्मधारय समास के अंतर्गत रखा गया है। सभी समासों का विस्तृत विवरण आगे दिया गया है।

प्रयोग की दृष्टि से समास के पुनः तीन भेद किए जाते हैं-

  • संयोगमूलक समास
  • आश्रयमूलक एवं
  • वर्णनमूलक समास

संस्कृत में समास कितने प्रकार के होते हैं?

संस्कृत व्याकरण लघुसिद्धांतकौमुदी के अनुसार ‘समसनं समासः अर्थात संक्षेपीकरण को ही समास कहते हैं। संस्कृत में समास के पाँच भेद होते हैं।

  1. केवलसमास
  2. अव्ययीभाव समास
  3. तत्पुरुष समास
  4. कर्मधारय
  5. द्विगु
  6. बहुव्रीहि समास
  7. द्वंद समास

संस्कृत व्याकरण में यही पाँच समास होते हैं। संस्कृत में कर्मधारय समास तत्पुरुष समास का ही भेद माना जाता है। कर्मधारय समास में ही जब पूर्वपद संख्यावाचक हो तो उसे द्विगु समास कहते हैं। संस्कृत में द्विगु समास को कर्मधारय का ही भेद माना जाता है।

केवलसमास-जब समास तो होता है किन्तु उसका कोई विशेष नाम नहीं रखा जाता तो वह केवलसमास कहा जाता है। तत्पुरुष अथवा अव्ययीभाव इत्यादि की तरह उसकी विशेष संज्ञा नहीं होती है। केवलसमास को ही परंपरानुसार ‘सुप्सुपासमास’ के नाम से जाना जाता है।

अब आप जान गए होंगे कि समास क्या है। आइए अब समास के भेदों का परिचय प्राप्त कर लिया जाए।

अव्ययीभाव समास किसे कहते हैं?

जिस समास में प्रायः पूर्वपद के अर्थ की प्रधानता रहती है, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। जैसे-प्रतिदिन-यहाँ ‘प्रति’ यह पूर्वपद है जो अधिकरण का बोध कराता है, अतः ‘प्रतिदिन’ इस समस्त पद में भी अधिकरण की ही प्रधानाता है। अर्थात पूर्व पद की प्रधानता है।

अव्ययीभाव में अधिकांशतः पूर्वपद अव्यय होता है और उत्तर पद अनव्यय, किन्तु समास हो जाने के बाद समस्त पद अव्यय बन जाता है। इस समास में पूरा पद क्रियाविशेषण अव्यय होता है।  

अधिकांश अव्ययीभाव सामासिक पद अव्यय हो जाने के कारण नपुंसकलिंग की प्रथमा विभक्ति के एकवचन में स्थित पाये जाते हैं। जैसे-आमरण, यथासंभव, यथाशक्ति, प्रतिलोम, यथारूप, आजन्म इत्यादि।

अव्ययीभाव समास की पहचान-जिस समास में पहला पद आ, अनु, प्रति, यथा, भर, यावत, हर, बे आदि होता है वह अव्ययीभाव समास होता है।

तत्पुरुष समास किसे कहते हैं?

जिस समास में उत्तरपद के अर्थ की प्रधानता होती है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे-राजपुरुष, सूररचित (सूरदास द्वारा रचित) इत्यादि। जब तत्पुरुष समास बंता है तो पहला पद विशेषण और द्वितीय पद विशेष्य के रूप में होता है। अंतिम पद के विशेष्य होने के कारण उसी पद की प्रधानता रहती है।

जब भी आपने कोई तत्पुरुष सामासिक पद देखा होगा तो पाया होगा कि ज़्यादातर उसके दोनों पद संज्ञा या पहला पद संज्ञा और दूसरा पद विशेषण के रूप में होता है। 

उदाहरण-

राजा का कुमार=राजकुमार                                                                                                                                      धर्म का ग्रंथ=धर्मग्रंथ                                                                                                                                               कला करने वाला=कलाकार

 तत्पुरुष समास के भेद

तत्पुरुष समास के तीन भेद हैं-(क) तत्पुरुष, (ख) कर्मधाराय और (ग) द्विगु। इसके अतिरिक्त विभक्तियों के नामों के अनुसार तत्पुरुष समास के छह भेद माने जाते हैं-

  • कर्मतत्पुरुष-जिस तत्पुरुष समास में कर्मकारक कि विभक्ति ‘को’ का लोप हो जाता है उसे कर्मतत्पुरुष कहते हैं, जैसे-स्वर्गप्राप्त-स्वर्ग को प्राप्त; गगनचुम्बी-गगन को चूमने वाला
  • करण तत्पुरुष-जब करण कारक की विभक्ति ‘से’ अथवा ‘के द्वारा’ का लोप हो जाता है, तो करण तत्पुरुष समास होता है। जैसे-नीतियुक्त-नीति से युक्त; भयाकुल-भाय से आकुल।
  • संप्रदान तत्पुरुष-जब संप्रदान कारक की विभक्ति ‘के लिए’ का लोप हो जाता है, तब संप्रदान तत्पुरुष होता है। जैसे-विद्यालय-विद्या के लिए आलय; यज्ञशाला-यज्ञ के लिए शाला।
  • अपादानतत्पुरुष-जिस तत्पुरुष समास में अपादान कारक की विभक्ति ‘से’ का लोप हो जाता है, उसे अपादान तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे-ऋणमुक्त-ऋण से मुक्त; ईश्वरविमुख-ईश्वर से विमुख
  • संबंध तत्पुरुष-जब संबंध कारक की विभक्ति ‘का’, ‘की’, ‘के’ का लोप हो जाता है, तो उसे संबंध तत्पुरुष कहते हैं। जैसे-राजपुत्र-राजा का पुत्र; सेनापति-सेना का पति; राजदरबार-राजा का दरबार।
  • अधिकरण तत्पुरुष-जब ‘में’ और ‘पर’ विभक्तियाँ लूप हो जाती हैं, तो अधिकरण तत्पुरुष होता है। जैसे-पुरुषोत्तम-पुरुषों में उत्तम; आपबीती-आप पर बीती।

कर्मधारय समास किसे कहते हैं?

जिस तत्पुरुष समास का उत्तरपद प्रधान हो तथा पूर्वपद तथा उत्तर पद में विशेष्य-विशेषण भाव को प्राप्त हों, या उनमें उपमान-उपमेय संबंध हो, वह कर्मधाराय समास कहा जाता है। ऐसे समस्त पद में दोनों पदों के लिंग वचन समान होते हैं।

कर्मधाराय समास के चार भेद माने जाते हैं-1. विशेषण पूर्वपद, 2. विशेष्यपूर्वपद, 3. विशेषण उभयपद, 4. विशेष उभय पद।

कर्मधारय समास की पहचान- जिस समास के समस्त पद का विग्रह करने पर दोनों पदों के मध्य में ‘है जो’ अथवा ‘के समान’ विभक्ति आती है, वह कर्मधारय समास होता है। जैसे-चरणकमल-कमाल के समान चरण।

कर्मधारय समास के उदाहरण-महादेव, मृगनयनी, नीलकंठ, परमानंद, नरसिंह इत्यादि।

कर्मधारय समास की विशेषता होती है कि इसका कभी पहला पद, कभी दूसरा पद और कभी दोनों ही पद विशेषण के रूप में होते हैं। ठीक ऐसे ही कभी पहला पद, कभी दूसरा पद, और कभी दोनों ही पद विशेष्य की श्रेणी के होते हैं। जैसे-नीलकमल, परमेश्वर इत्यादि।

द्विगु समास किसे कहते हैं?

जिस समस्त पद का पूर्वपद संख्यावाचक हो, वह द्विगु समास कहा जाता है। यह कर्मधारय समास का ही एक भेद होता है। इसमें पूर्वपद संख्यावाचक होने के साथ-साथ विशेषण भी होता है। द्विगु समस्त पद से समूह या समाहार (समुदाय) का बोध होता है। जैसे-सात ऋषियों का समूह=सप्तर्षि।

नोट-अनेक बहुव्रीहि समासों के समस्त पदों में भी पूर्वपद संख्यावाचक होता है। ऐसी स्थिति में केवल समास विग्रह के द्वारा ही जाना जा सकता है कि समास द्विगु है या बहूव्रीहि।

द्विगु समास के उदाहरण-चौराहा, नवरात्र, तिरंगा, तरीकों, सप्तसिंधु, अष्टसिद्धि, अष्टांग इत्यादि।

बहुव्रीहि समास किसे कहते हैं?

जिस समस्त पद में कोई भी पद प्रधान नहीं होता तथा दोनों पद मिलकर किसी अन्य पदार्थ या पद की ओर संकेत करते हैं तो वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। जैसे-नीलकंठ अर्थात नीला है कंठ जिसका यानि भगवान शंकर। यहाँ न नील और ना कंठ दोनों में से कोई भी पद प्रधान नहीं है। दोनों पद मिलकर किसी तीसरे पदार्थ (शिव शंकर) की ओर संकेत कर रहे हैं।

ठीक इसी प्रकार चक्रपाणि, दशानन, लंबोदर, चन्द्रमौलि, निशाचर, गिरिधर, इत्यादि समस्त पदों में बहुव्रीहि समास है।

तत्पुरुष और बहुव्रीहि समास में अंतर-दोनों में यह अंतर है कि तत्पुरुष समास में प्रथम पद द्वितीय पद का विशेषण होता है, जबकि बहुव्रीहि में दोनों पद किसी तीसरे पदार्थ के विशेषण होते हैं।

बहुव्रीहि समास के चार भेद हैं-

  1. समानाधिकरण बहुव्रीहि
  2. व्यधिकरण बहुव्रीहि
  3. तुल्ययोग बहुव्रीहि
  4. सद्यबहुव्रीहि

बहुव्रीहि समास क्या है जान लेने के पश्चात अब आप द्वंद समास किसे कहते हैं यह भी जान लीजिये।

द्वंद समास किसे कहते हैं?

जिस समास में दोनों पद समान रूप से प्रधान हों, वह द्वंद समास कहलाता है। इस समास के समस्त पदों में प्रायः योजक चिन्ह (-) पाया जाता है।

द्वंद समास के तीन भेद माने जाते हैं-

1. इतरेतर द्वंद-द्वंद समास का ऐसा समस्त पद जिसका विग्रह करने पर सभी पद ‘और’ से जुड़े हुए हों तथा समास के सभी पद अपना अलग अस्तित्व रखते हों, ‘इतरेतर द्वंद’ कहा जाता है। जैसे-ऋषि-मुनि=ऋषि और मुनि। एक अन्य उदाहरण देखिये-राम और कृष्ण=राम-कृष्ण।

गाय-बैल=गाय और बैल। यहाँ दोनों पद आपस में ‘और’ से जुड़े हुए हैं।

इतरेतर द्वंद की विशेषता है कि इस समास का शब्द हमेशा बहुवचन में ही प्रयोग किया जाता है। जैसे ‘मेरे भाई-बहन आए हैं’, इस वाक्य में आपने देखा कि भाई-बहन समस्त पद बहुवचन में प्रयुक्त हुआ है।

आपने यह भी ध्यान दिया होगा कि भाई-बहन समस्त पद में दोनों पद अपना अलग-अलग अस्तित्व लिए हुए हैं। कोई भी पद किसी अन्य पद से प्रधान नहीं है।

2. समाहार द्वंद-संस्कृत में ‘समाहार’ शब्द का अर्थ होता है समूह। जब द्वंद समास के दोनों पद ‘और’ से जुड़े होने के बावजूद भी अपना अलग-अलग अस्तित्व न रखते हों, तो समाहार द्वंद होता है। जैसे-घर-द्वार=घर और द्वार। किन्तु इस समस्त पद में सिर्फ घर और द्वार का ही तात्पर्य नहीं है बल्कि घर और द्वार और अन्य ऐसी चीज़ें।

तात्पर्य यह है कि समाहार द्वंद में दोनों पदों के अलावा भी अन्य पद अप्रत्यक्ष रूप से समाहित रहते हैं। जैसे जमीन-जायदाद यानि जमीन और जायदाद के साथ-साथ अन्य संपत्ति की चीज़ें भी।

3. वैकल्पिक द्वंद-जब दोनों पद आपस में ‘या’, ‘अथवा’ इत्यादि शब्दों से जुड़े हों, तो वैकल्पिक द्वंद समास होता है। वैकल्पिक द्वंद समास की विशेषता है कि इसमें दो अलग-अलग आठों वाले विपरीत शब्दों का योग होता है। जैसे-पाप-पुण्य।

किसी भी समस्त पद में एक से अधिक समास हो सकते हैं। केवल समास-विग्रह के पश्चात ही यह बताया जा सकता है कि उसमें कौन-से समास हैं।   

संधि और समास में क्या अंतर है?

संधि और समास दोनों में ‘मेल’ ही होता है किन्तु दोनों में बहुत अंतर पाया जाता है। संधि और समास में निम्नलिखित अंतर हैं-

  • संधि में दो वर्णों का मेल होता है किन्तु समास में दो पदों का मेल होता है।
  • संधि में वर्णों के मेल से विकार उत्पन्न होता है जबकि समास में ऐसा नहीं होता। समास में प्रत्यय का लोक होता है।
  • समास के पदों को अलग करने की प्रक्रिया ‘विग्रह’ कहलाती है जबकि संधि को तोड़ने को संधि-विच्छेद कहते हैं।
  • हिन्दी भाषा में संधि सिर्फ तत्सम शब्दों में होती है जबकि समास किसी भी प्रकार के शब्दों जैसे कि तत्सम, उर्दू, हिन्दी इत्यादि में हो सकती है।
  • पदों में समास बनाने के लिए संधि की अनिवार्यता नहीं होती।

समास किसे कहते हैं यह हिन्दी व्याकरण के पाठकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। समास के अध्ययन के बिना आप हिन्दी भाषा की गहराई को नहीं समझ सकते। हिन्दी साहित्य को जानने-समझने के लिए और कही गई बात के संदर्भ को भली-भांति आत्मसात करने के लिए समास का ज्ञान आवश्यक है। इस लेख के द्वारा आप समास के सभी भेदों और अर्थों से परिचित हो गए होंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

समास विग्रह किसे कहते हैं?

सामासिक शब्द के पदों के बीच संबंध को बताते हुए पदों को अलग-अलग करना समास विग्रह कहा जाता है।

समास के कितने भेद हैं?

हिन्दी में समास के 6 मुख्य भेद माने जाते हैं। इनके उपभेद भी किए गए हैं।

समास की परिभाषा क्या है?

समास की परिभाषा: दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने एक स्वतंत्र एवं सार्थक शब्द को सामासिक शब्द कहते हैं तथा उन दो या अधिक शब्दों के संयोग को समास के नाम से जाना जाता है। सामासिक शब्द को ‘समस्त पद’ भी कहा जाता है।

Leave a Reply