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समता

समता का अर्थ प्रत्येक परिस्थिति में समान भाव या समभाव की अवस्था है | चाहे सामान्य जीवन हो या आध्यात्मिक जीवन- दोनों में ही समता भाव का विशेष महत्व है | आध्यात्मिक जीवन में समता एक महत्वपूर्ण आधार है जो मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है| मनुष्य का मन ही मूल है लेकिन यह मन ही सुख और दुख का कारण भी है | ध्यान से देखने पर इसको समझा जा सकता है | मन की प्रवृत्ति है कि वह सामान्यत: भूतकाल में जाता है जो बीत चुका है तथा जो वापस नहीं लौट सकता है या आगे भविष्य की कल्पना बनाता है जो बिल्कुल ही अनिश्चित है | मन वर्तमान का जो क्षण है उसमें टिकना नहीं चाहता जबकि वर्तमान का क्षण ही वास्तविक सत्य है | अब समस्या यहीं से प्रारंभ होती है क्योंकि शरीर वर्तमान में है जबकि शरीर का ही एक भाग मन या तो भूतकाल में है अथवा भविष्य काल में |
मन चाहे भूतकाल में हो या भविष्य काल में यह हमेशा दो तरह की प्रवृत्ति रखता है | यदि भूतकाल में कोई दु:खद घटना याद आती है तो द्वेष करने लगता है वही भूतकाल की कोई सुखद घटना याद आती है तो राग करने लगता है | उसी तरीके से भविष्य काल में कोई सुखद कल्पना है तो राग करता है और यदि कोई दु:खद घटना है तो द्वेष करता है | राग- द्वेष करना यही सुख और दुख का मूल कारण है | जब राग होता है तो मन उसे और चाहता है क्योंकि अनुभूति सुखद लगती है | उसी प्रकार जब किसी चीज से द्वेष होता है तो मनुष्य भागना चाहता है क्योंकि अनुभूति दु:खद होती है |


सुख – दुख का एहसास हमारी अनुभूति पर निर्भर करता है | पेंडुलम को ध्यान से देखने पर इसे समझा जा सकता है | पेंडुलम एकदम बाएं रहता है फिर मध्य में आता है और फिर दाएं छोड़ चला जाता है | फिर उसी प्रकार दाएं छोर से होकर मध्य और फिर बाएं छोर तक चला जाता है | पेंडुलम के सबसे बाएं सिर पर सर्वाधिक राग के कारण सबसे सुखद स्थिति है | वही पेंडुलम के दाएं सिरे पर सर्वाधिक द्वेष के कारण सबसे दु:खद स्थिति है| लेकिन हम भूल जाते हैं कि इन दोनों के बीच एक मध्य बिंदु है जहा न तो राग है और न हीं द्वेष है | और इसी के कारण ना ही सुख है और ना ही दु:ख | यही ‘मध्यम-मार्ग’ का सिद्धांत है | महान योगियों और साधकों में यही विशेष गुण पाया जाता है | इसी मध्य स्थिति को भगवान बुद्ध ने ‘मध्यम पदिपदा’ कहा है | आनंद का स्रोत यहीं है | आनंद का मार्ग यहीं से प्रशस्त होता है | सामान्यतः लोग सुख की अवस्था को ही आनंद समझ लेते हैं | लेकिन सुख के बाद दु:ख की स्थिति आती है जबकि आनंद सतत और शाश्वत होता है | ‘सतचितानन्द’ में जो आनंद की स्थिति है वह यही है |

इसी मध्य स्थिति में रहने पर सुख और दु:ख मनुष्य को विचलित नहीं कर पाता | अधिकांश मनुष्य सुख में अति खुश रहते हैं और दु:ख आते हैं उतने ही दु:खी हो जाते हैं | कुछ मनुष्य तो अति दु:ख की अवस्था को सहन नहीं कर पाते तथा आत्महत्या तक की प्रवृत्ति तक चले जाते हैं | लेकिन जो मनुष्य सम्यक ज्ञानी है वह सुख और दुख दोनों में ही समता की स्थिति बनाए रखता है| दरअसल वह उसी मध्य बिंदु की स्थिति में रहता है |
सुख और दु:ख दोनों स्थितियों में “स्थितप्रज्ञ” होते हुए समता की अवस्था बनाए रखा जा सकता है | गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा-

दुःखेष्वद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।

वीतरागभयक्रोध स्थितधीक्षैनिरुच्यते ॥

” हे पार्थ ! दु:ख भोगते हुए भी जिसके मन में उद्वेग नहीं होता और ना ही जो सुख की लालसा रखता है तथा जिसके हृदय में क्रोध, मोह आदि विकारों के लिए कोई स्थान नहीं होता वही मनुष्य स्थितप्रज्ञ है | “


मनुष्य थोड़े से अभ्यास से समभाव या समता के नियम को जीवन में पालन कर सकता है | एक दिन भोजन बहुत अच्छा मिलता है तो बहुत खुश होते हैं , किसी दिन भोजन ख़राब मिलता है तो पूरा घर सिर पर उठा लेते हैं | मनुष्य को दोनों में समान रहना चाहिए | जब परीक्षा में अच्छे परिणाम आते हैं तो खुशी का ठिकाना नहीं होता वहीं ख़राब परिणाम आने पर मृत दिखाई पड़ते हैं | जबकि मनुष्य को दोनों परिस्थितियों में सत्य को स्वीकार कर समभाव या समता को बनाए रखना चाहिए | जब कोई हमारी प्रशंसा और गुणगान करता है तो छाती चौड़ी कर फूले नहीं समाते वहीं जब कोई हमारी बुराई या आलोचना करता है तो हम आग -बबूला हो जाते हैं | दोनों ही स्थितियों में समभाव या समता होनी चाहिए | हमारा मन भी विचारों का पुंज है | एक वैज्ञानिक तथ्य है कि प्रत्येक दिन हमारे मानस पटल पर लगभग साठ हज़ार विचार गुजरते है | प्रत्येक क्षण अनेकों विचार मानस पटल पर आते रहते हैं | यदि कोई अच्छा विचार आता है तो हम प्रसन्न होते हैं | वही कोई बुरा विचार आता है तो हमें दु:खी कर जाता है | मनुष्य को दोनों ही विचारों में समभाव या समता कायम रखनी चाहिए | कहने को ये छोटे प्रयास है लेकिन इनके अभ्यास से प्रत्यक्ष ज्ञान स्थिर होगा तथा सुख और दु:ख दोनों ही स्थितियों में संतुलित रहते हुए जीवन को बेहतर जिया जा सकता है |

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