You are currently viewing संशयात्मा विनश्यति
संशयात्मा विनश्यति

संशयात्मा विनश्यति

“संशयात्मा विनश्यति” का अर्थ है कि जो भी “आत्मज्ञान” से रहित और “अश्रद्धालु” है तथा जो “संशयात्मा” है, उनका विनाश तय है।सनातन धर्म में बहुत सारे वेद-पुराण तथा ग्रन्थ है और उन्ही ग्रंथो में एक ग्रन्थ है “महाभारत”। महाभारत के युद्ध में भगवान श्री कृष्ण जब कुरुक्षत्र में अर्जुन को “श्रीमद् भगवद्गीता” का ज्ञान दे रहें थे तब भगवान श्री कृष्ण ने कुल 700 श्लोक कहें और उन्हीं श्लोकों में से एक श्लोक “संशयात्मा विनश्यति” विषय से जुडी है। आइये जान लेते है, संशयात्मा विनश्यति से जुड़े इस महान श्लोक के गूढ़ ज्ञान क्या है |

संशयात्मा विनश्यति अर्थ

“संशयात्मा विनश्यति” का अर्थ है कि संशय बहुत बड़ा पाप है और यही विनाश का कारण भी है। सनातन धर्म पुराणों के अनुसार, जो भी “आत्मज्ञान” से रहित और “अश्रद्धालु” है तथा जो “संशयात्मा” है, उनका विनाश तय है। ऐसा कहा गया है कि ” ज्ञानहीन तथा अश्रद्धालु का विनाश तो होता है परन्तु जिनमें संशय होता है उनका विनाश पहले होता है क्योंकि वो सबसे अधिक पापी होते है। अधिक पापी इस कारण कहते है क्योंकि संशयात्मा अर्थात “जिनके चित्त में संशय का वास हो”। जिनके भी चित्त में संशय का वास होता है उन्हें ना तो मनुष्यलोक की प्राप्ति होती है और ना ही परलोक की। संशयात्मा को सुखों की प्राप्ति भी नहीं होती इसलिए संशय का त्याग करना चाहिए।

संशयात्मा विनश्यति श्लोक

अगर हम बात करे “संशयात्मा विनश्यति” के पूर्ण श्लोक की, तो यह श्लोक संस्कृत भाषा में लिखी गई है जो इस प्रकार है :


।।अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।।
।।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।

संशयात्मा विनश्यति स्रोत

संशयात्मा विनश्यति श्लोक – श्रीमद् भगवद्गीता के चौथे अध्याय का चालीसवां श्लोक है। इस श्लोक को भगवान श्री कृष्ण ने कहा था और इस श्लोक के द्वारा प्रभु श्री कृष्ण ने यही शिक्षा दी कि ” मनुष्यों को संशय का त्याग करना चाहिए। ये संशय पापी और विनाशकारी है।”

संशयात्मा विनश्यति भगवदगीता


संशयात्मा विनश्यति का उल्लेख “श्रीमद् भगवद्गीता” में की गई है। इस श्लोक को प्रभु श्री कृष्ण ने उस समय कहा था जब उन्होंने अर्जुन को श्रीमद् भगवद्गीता का ज्ञान दिया था। भगवान श्री कृष्ण के द्वारा कहे गए इस श्लोक का अर्थ यही है कि “जो मनुष्य विवेकहीन तथा संशयात्मा हो उसका पतन निश्चित है”। ऐसे लोगों के लिए कोई भी लोक नहीं और नाही वो सुख भोग पाते है। ज्ञानहीन तथा श्रद्धाहिन मनुष्य तो नष्ट होते ही है परन्तु संशय करने वालों मनुष्य का विनाश तो पहले से ही तय होता है। प्रभु श्री कृष्ण कहते है कि संशयात्मा को न भूलोक और ना ही परलोक की प्राप्ति होती है।


विनश्यति का अर्थ


विनश्यति का अर्थ है – नष्ट हो जाना अथवा मर जाना। विनश्यति का अर्थ यह भी है – “विनाश का होना”।

संशयात्मा विनश्यति निबंध

संशयात्मा विनश्यति लिया गया है श्रीमद् भगवद्गीता के चौथे अध्याय से। यह श्लोक भगवान श्री कृष्ण, अर्जुन से कहते है, जो की इस प्रकार है :-

।।अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।।
।।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।

इस श्लोक में उल्लेखित “अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति” का अर्थ है जिस भी मनुष्य का “विवेक” अभी तक नहीं जगा या फिर जितना विवेक जगा है यदि मनुष्य उतने को ही महत्व ना दे और साथ ही साथ वो मनुष्य “श्रद्धाहीन” व्यक्ति हो तो ऐसे संशय से युक्त मनुष्य का “पारमार्थिक मार्ग” में पतन तय है। इसका कारण यही है कि इस प्रकार के संशययुक्त मनुष्य की अपनी बुद्धि और विवेक प्राकृत शिक्षा रहित ही होती है।

ऐसे लोग दूसरों का अनादर करते है तो ऐसे मनुष्य की संशय कैसे नष्ट हो और बिना संशय के नाश के मनुष्य की उन्नति हो ही नहीं सकती है। यदि मनुष्य अलग-अलग लोगों की तरह-तरह की बातें सुने और हर बात पर कहे की ये भी ठीक है और वो भी ठीक है तो इस प्रकार की संदेहात्मक स्थिति पालने वाले मनुष्य को ही “संशयात्मा” कहते है। वैसे तो, पारमार्थिक मार्ग पर जो साधक चलते है उनमें संशय होना स्वाभाविक है क्योंकि मनुष्य जब किसी विषय को पढ़ेगा तो संशय भी उत्पन्न होगी और बिना संशय उत्पन्न हुए वो कुछ समझ भी नहीं पायेगा।

परन्तु जब पूरा पढ़ने पर समझ आ जाती है तो संशय भी दूर हो जाती है क्योंकि मनुष्य किसी भी विषय को जब पढ़ेगा तो उस विषय से जुड़े ज्ञान को समझेगा या फिर कुछ भी नहीं समझेगा और जब मनुष्य किसी विषय को नहीं समझते तो उस विषय में संशय होती भी नहीं है। अतः संशय का जन्म सदा ही “अधूरे ज्ञान” के कारण होता है और यही “अज्ञानता” कहलाता है। अतः मनुष्यों के मन में संशय का जन्म होना हानिकारक नहीं होता परन्तु उस संशय को मनुष्य जब बनाये रखते है और उसे दूर करने की चेष्टा तक नहीं करते तो ये हानिकार सिद्ध होता है।

संशय को दूर न करने पर संशय ही मनुष्यों के लिए “सिद्धांत” का रूप धारण कर लेता है। इसका कारण यह है कि जब संशय दूर न हो तो मनुष्य यही सोचता है कि पारमार्थिक राह पर प्रत्येक चीज ही ढ़कोसलावादी है और यही सोच बनाकर मनुष्य नास्तिक बन जाता है| जिसके फलस्वरूप मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है। अतः मन में संशय को पालना मनुष्य को बुरा अवश्य लगना चाहिए।

मनुष्य को जब यही संशय बुरा प्रतीत होता है तब मनुष्य के भीतर जिज्ञासा जन्म लेती है और जिज्ञासा का जब अंत होता है तब संशय का विनाश और मनुष्य के जीवन में ज्ञान का आगमन होता है। साधकों का लक्षण ही होता है खोज करना। परन्तु, यदि साधक अपने मन तथा ज्ञानेन्द्रियों से देखी और सुनी बातों पर भरोसा कर लें तो साधक वहीँ रुक जाता है और जीवन में कभी भी आगे नहीं बढ़ पाता। साधकों के लिए जीवन में निरंतर आगे बढ़ना अति आवश्यक है। जिस प्रकार – मनुष्य जब किसी मार्ग पर चलता है तो वह यह नहीं देखता कि उसने कितनी दूरी तय कर ली बल्कि मनुष्य यही देखता है कि अभी कितनी दूरी और तय करनी है और मनुष्य अपने मंजिल तक पहुँच ही जाता है।

इसी प्रकार साधक को भी यह नहीं देखना चाहिए कि मैनें कितना जान लिया बल्कि उन्हें यह देखना चाहिए वो और कितना ज्ञान प्राप्त कर सकते है और उस ज्ञान से भी अधिक ज्ञान को प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए। साधक को अपने प्राप्त किये हुए ज्ञान पर संतोष या अभिमान के कारण कभी विराम नहीं लगानी चाहिए बल्कि ज्ञान के मार्ग पर चलते रहना चाहिए। साधक यदि अपने मार्ग पर ना रुके तो वो साधक संत – महात्माओं अथवा ग्रंथो से अवश्य ज्ञान पा लेता है और संशय भी नष्ट हो जाता है। यदि साधक को संशय दूर करने के लिए कोई भी न मिला तब भी ईश्वर कृपा से साधक का संशय अवश्य दूर हो जाता है।

“जीवात्मा, परमात्मा का ही अंश है”। अतः साधक अपने परमात्मा की खोज में लगा ही रहता है और जब खोज पूरी नहीं होती तो वह अत्यंत दुखी भी हो जाता है। परन्तु, अपने अंश के उस दुःख को परमात्मा भी सह नहीं पाते, अतः उस दुःख की पूर्ति भी परमात्मा स्वयं ही करते है। इसी प्रकार जब साधक को अपने अंदर के संशय से दुःख होता है तब वो दुःख ईश्वर को भी असहनीय लगता है। साधक को अपने संशय को दूर करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि जिस भी संशय के कारणवश उस साधक को दुःख और पीड़ा होती है, ईश्वर स्वयं उस संशय और दुःख का नाश कर देते है।

संशय युक्त साधक की पुकार ईश्वर अवश्य ही सुनते है। संशय साधक की उन्नति में बाधक होता है और इसलिए उस संशय हो दूर करने में ही उसकी भलाई है। समस्या यही होती है कि मनुष्य अपने द्वारा पाए हुए ज्ञान को ही अतिरिक्त मान कर संतोष तथा अभीमान कर लेता है और यही सोचता है कि “मै ही सही और ज्यादा जानता हूँ “। यही अभिमान उस मनुष्य का विनाश करने वाला होता है।

“नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः” इस श्लोक में ऐसे संशय युक्त मनुष्य अर्थात संशयात्मा का उल्लेख है जो कि “अज्ञानी” और “अश्रद्धालु” व्यक्ति है। इस का अर्थ यही है कि – मनुष्य के अंदर संशय रहने पर उस मनुष्य कि ना तो अपनी विवेक और बुद्धि होती है और ना ही वो किसी दूसरे के बातों को स्वीकारता है। इस कारण उस संशयात्मा अर्थात संशय से युक्त मनुष्य का विनाश हो जाता है। उस मनुष्य के लिए ना तो ये लोक, ना तो परलोक और ना ही सुख होता है।

संशयात्माओं का इस लोक में सभी से व्यवहार बिगड़ ही जाता है। इसका कारण यह है कि वह मनुष्य प्रत्येक विषय और बातों पर संशय ही करता है उसके अनुसार कभी ये आदमी सही और कभी दूसरा आदमी सही और पहला गलत। वो मनुष्य हर बात में अपने हित और अहित का ही सोचता है। उस संशयकारी मनुष्य को ना तो मोक्ष मिलता है और ना ही परलोक में कल्याण की प्राप्ति होती है |

क्योंकि इस कल्याण में “निश्चयात्मिका बुद्धि” की जरुरत पड़ती है और संशयात्मा मनुष्य हमेशा दुविधा में ही रहता है और जीवन में कोई निर्णय नहीं कर पाता| साधारण निर्णय से लेकर जीवन के गूढ़ निर्णय यथा – इस संसार से जुड़े कार्यों में संलिप्त रहूँ या अध्यात्म में मार्ग पर चलूँ । मनुष्य के भीतर यदि संशय भरी पड़ी रहें तो मनुष्य को सुख और शांति को प्राप्ति कभी भी नहीं होगी। अतः मानव को अपने विवेक और श्रद्धा के सहारे अपने संशय को मिटा देना अति आवश्यक है, अन्यथा यह विनाश को प्राप्त होता है ।

Leave a Reply