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विनाश काले विपरीत बुद्धि | vinash kale viprit buddhi

विनाश काले विपरीत बुद्धि | vinash kale viprit buddhi

सनातन धर्म तथा भारत देश में कई प्रकार के श्लोक, मंत्र, मुहावरें तथा कहावतें बोली जाती है और हर एक का अलग-अलग अर्थ तथा एक विशेष महत्व होता है। हमारी संस्कृति के इतिहास के पन्नो को अगर पलट कर देखा जाए तो ऐसे कई कहावतें हमे हमारे ‘वेद-पुराण’ तथा शास्त्रों में श्लोंको के रूप में मिलेंगी और उन्हीं शास्त्रों में से एक शास्त्र है “अर्थशास्त्र” और इसे लिखा था “चाणक्य” ने। अर्थशास्त्र के 16वें अध्याय में चाणक्य ने “विनाश काले विपरीत बुद्धि” के ऊपर एक श्लोक लिखा, जिसे आज के दौर में एक कहावत के तरह हिंदी भाषा में उपयोग किया जाता है, आइये इस कहावत अर्थात ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ से जुड़ीं कुछ जरुरी तथ्यों को जान लेते है |


विनाश काले विपरीत बुद्धि अर्थ

“विनाश काले विपरीत बुद्धि” का अर्थ यह है कि “जब भी कोई मनुष्य किसी विषम परिस्थिति में फस जाए और उसका विनाश निकट आ जाए हो तो उसकी बुद्धि भ्र्ष्ट हो जाती है।“ जब भी किसी इंसान की मृत्यु या विनाश का समय आता है तो उस इंसान की बुद्धि और उसका विवेक काम करना बंद कर देते है जिससे की इंसान सही निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है। वैसे तो, धर्मग्रंथों तथा धर्मशास्त्रों की ओर यदि आप देखेंगे तो, विनाश पहले से ही तय होता है और उस विनाश का साथ देती है हमारी बुद्धि और हमारे गलत कर्म जिससे की वह विनाश बड़ी ही सरलता से संपन्न भी हो जाता है। परन्तु, ऐसा भी नहीं की सर्वदा मनुष्यों के जीवन में विनाश स्वयं ही चल कर आता है अपितु जीवन में की गई छोटी-छोटी गलतियां भी बड़ी और भयावह रूप धारण कर के विनाश का कारक बन जाती है और इंसान अपने ही द्वारा किये गए दुष्कर्मों से बच नहीं पाता। अतः, यदि आप इस कहावत से सिख ले, तो विनाश को टाला भी जा सकता है।


विनाश काले विपरीत बुद्धि पूर्ण श्लोक


अगर, हम बात करे “विनाश काले विपरीत बुद्धि” के पूर्ण श्लोक की, तो यह श्लोक संस्कृत भाषा में लिखी गई है जो इस प्रकार है:


। ।न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरङ्गी। ।
। ।तथाऽपि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः। ।


विनाश काले विपरीत बुद्धि कोट्स


आइये, आज हम आपको “विनाश काले विपरीत बुद्धि” कोट्स और इससे जुड़े कुछ अनमोल वचन बतलाते है :


• विनाश काले विपरीत बुद्धि, कीजिये “महादेव” हम सब की शुद्धि।
• विनाश काले विपरीत बुद्धि, तन की “शुद्धि” से बड़ी मन की “शुद्धि”
जहाँ मन में हो संघर्ष और जित का हो विश्वास !!
वहाँ प्रभु खुद करते है वास !!
• उल्टी “बुद्धि” होने से “विनाश” का काल तय है।
• किसी ने सच ही कहा है की जब दुर्दिन आते है तो अच्छी-खासी बुद्धि को भी लकवा मार देता है ।
• घमंड के अंधे इंसान को न तो अपनी भूल नजर आती है और ना ही दूसरों की अच्छी बातें – विनाश काले विपरीत बुद्धि!!


विनाश काले विपरीत बुद्धि निबंध


सनातन धर्म से जुड़ें ग्रन्थ, शास्त्र तथा पुराने कहानियों के तरफ यदि हम देखे तो हम पाएंगे की “विनाश काले विपरीत बुद्धि” का सम्बन्ध ‘भाग्यवाद’ से है ना की ‘कर्मवाद’ से, परन्तु हम इसमें दोनों का ही समावेश मानते है। भाग्य और कर्म दोनों ही इसमें समाहित है। चाहे तो किसी भी ग्रंथ को उठा कर देख ले आप, फिर चाहे वो प्रभु श्री राम का उस हिरन के पीछे जाना जो स्वर्ण से निर्मित था, जिसका निर्माण भगवान ब्रह्म देव ने भी कभी नहीं किया, न तो स्वर्ण के हिरन के बारे में किसी ने सुना न ही उसे देखा फिर भी प्रभु श्री राम उसके पीछे गए और माता सीता का अपहरण रावण के हाँथो हुआ |

या फिर श्री कृष्ण की लीला को देख ले जिसमे कंश को पहले से ही आकाशवाणी के माध्यम से पता चल चूका था की देवकी कि आठवीं संतान उसका वध कर देगी परन्तु कंश ने अपने कर्मों को सुधारने के वजाये अपने पाप के घड़ों को और भरता ही चला गया। नियति ने रावण और कंश को उनके विनाश के बारे पहले ही बतला दी, परन्तु उन्होंने उससे सिख न लेकर अपने विनाश को अपने दुष्कर्मों तथा कुपित बुद्धि के बल पर स्वयं आमंत्रित किया। अगर, रावण और कंश अपने बुद्धि का सदुपयोग कर सत्य के मार्ग पर चलते तो कदाचित उनका विनाश न होता ।


आइये विनाश काले विपरीत बुद्धि को हमारे धर्मग्रंथो जैसे की – रामायण, महाभारत तथा श्री कृष्ण के जीवन से जुडी कई पौराणिक घटनाओं से जोड़कर समझते है, जो की इस प्रकार है :


रावण को मिला महाराज अनरण्य का श्राप :


इक्ष्वाकु कुल में जन्मे एक महाप्रतापी तथा महान राजा थे राजा अनरण्य। उस समय रावण बहुत ही बलशाली तथा विद्रोही राजा था, बहुत सारे राजाओं के राज्य को हड़पने के बाद उसकी नजर राजा अनरण्य की नगरी अयोध्या पर पड़ी और रावण ने राजा अनरण्य के नगरी पर आक्रमण कर दिया। दोनों के बिच महायुद्ध हुआ जिसमे भगवान ब्रम्हा के आशीर्वाद से रावण के प्राण तो बच गए पर राजा अरण्य के प्राण निकल गए और मृत्यु के पहले राजा अरण्य ने रावण को श्राप दिया की इसी इक्ष्वाकु कुल में जन्में पुरुष के हाँथो तुम्हारा वध होगा। भविष्य में इक्ष्वाकु कुल में जन्मे प्रभु श्री राम के हाँथो रावण का वध हुआ और इस तरह से रावण का विनाश तय था।


रावण को मिला भगवान शिव के वाहक नंदी का श्राप


एकबार रावण अपने इष्ट देव भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पंहुचा और वहाँ उसने नंदी के रूप-रंग का मजाक उड़ाया तथा नंदी को वानरमुखी कह दिया, इससे क्रोधित होकर नंदी जी ने रावण को श्राप दिया की भविष्य में कोई वानर ही तुम्हारे विनाश का कारण बनेगा और भविष्य में श्री हनुमान जी ने इस श्राप की सत्यता का प्रमाण भी दिया ।


रावण को मिला तपस्विनी का श्राप :


पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण अपने पुष्पक विमान से यात्रा पर निकला और रास्ते में रावण ने एक अति सुन्दर तपस्विनी को देखा जो साधना में लीन थी और उस तपस्विनी ने मन ही मन भगवान विष्णु को पति के रूप में वरण कर लिया था परन्तु रावण ने उस तपस्विनी के केश खींचकर उसे अपने साथ चलने को विवश किया। तपस्विनी ने रावण के साथ जाने से इंकार किया और श्राप दिया की भविष्य में एक नारी ही तेरे विनाश का कारण बनेगी और यह कह कर तपस्विनी ने अपने प्राण त्याग दिया। भविष्य में एक नारी अर्थात माता सीता के कारण रावण का सर्वनाश हुआ।


रावण को मिला नलकुबेर का श्राप :


एकबार रावण स्वर्ग पर विजय पाने हेतु स्वर्गलोक पहुँच गया और वहाँ उसने रम्भा नाम की अप्सरा को देखा। रम्भा की सुंदरता देख रावण ने उसे विवश किया अपने साथ चलने के लिए, परन्तु रम्भा ने रावण के साथ जाने से इंकार कर दिया और रम्भा ने कहा की मैं आपके भ्राता कुबेर के पुत्र नलकुबेर की जीवन संगिनी हूँ और इस नाते मैं आपकी पुत्रवधु हुई परन्तु रावण ने रम्भा के साथ बलपूर्वक दुराचार किया और यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दे दिया की “भविष्य में अगर वो नारी के स्वीकृति के बिना यदि उसे स्पर्श करे तो रावण का सिर 100 टुकड़ों में विभक्त हो जायेगा।


रावण को मिला बहन शूर्पणखा का श्राप :


रावण की बहन शूर्पणखा का पति विद्युतजिव्ह जो की कालकेय नामक राजा का सेनापति था। समस्त संसार पर विजय प्राप्त करने के लिए रावण ने राजा कालकेय के राज्य पर भी आक्रमण कर दिया और इस युद्ध में रावण ने अपनी बहन शूर्पणखा के पति विद्युतजिव्ह का वध कर दिया जिससे क्षुब्ध होकर शूर्पणखा ने अपने मन में ही रावण के प्रति घोर क्रोध में रावण को श्राप दे दी की तेरा विनाश मेरे ही कारण होगा ।


इस तरह से रावण को कई श्राप मिले जिनमे रावण की पत्नी की बहन ने भी रावण को श्राप दिया परन्तु इन सभी श्रापों के बावजूद भी रावण ने कोई सिख नहीं ली, सत्यता के राह पर नहीं चला और अपने दुष्कर्मों में सिर्फ बढ़ोतरी ही की। रावण का विनाश जितना निकट आता गया रावण ने उतने ही दुष्कर्म किये और ये सब उस कुपित बुध्दि के कारण था जो जन्म ले चूका था एक विनाश के रूप में जिसे रावण समझ तो गया था परन्तु अपने ही विनाश को देखकर रावण की बुद्धि सही के जगह उल्टी अथवा विपरीत दिशा में ही गमन कर रही थी जिसके फलस्वरूप रावण का वध हुआ। रावण ने अपने अहंकार में स्वयं ही अपना सर्वनाश करवाया अर्थात विनाश काले विपरीत बुद्धि।


अब महाभारत तथा प्रभु श्री कृष्ण की लीला से सम्बंधित पौराणिक घटनाओं की ओर चलते है |


कंश का विनाश :

प्रभु श्री कृष्ण के मामा कंश एक आतंकी राजा था जो साधु-संतों तथा गरीब और क्षुद्रों पर आक्रमण करता और भीषण अत्याचार करता था । उसके अत्याचार से मथुरा वासी तथा अन्य ग्रामों के वासी बहुत दुःख और कष्ट झेल रहे थे परन्तु किसी में भी साहस नहीं था की कंश को कोई भी हरा पाता। कंश की सेना में बहुत से जादुई शक्तियों वाले असुर भी थे जिनके बल पर कंश राज करता था। जब कंश ने अपनी बहन देवकी का विवाह वासुदेव जी से किया तो आकाशवाणी हुई जिसके माध्यम से कंश तथा सभी वासियों को पता चला कि देवकी की आठवीं संतान कंश का वध कर देगी परन्तु कंश ने अपने कर्मों को सुधारने के वजाये अपने पाप के घड़ों को और भरता ही चला गया और अपनी बहन देवकी के प्रत्येक संतान को मारता गया साथ ही साथ उसका आतंक पहले से भी अत्यधिक बढ़ता गया परन्तु नियति ने ऐसी मोड़ ली कि देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान के रूप में जन्में भगवान विष्णु के अवतार प्रभु श्री कृष्ण ने कंश का वध किया ।


कौरवों का विनाश :

महाभारत में धृतराष्ट्र की जब कोई संतान नहीं हो रही थी तब गांधारी ने भगवान शिव से अपने पाए हुए वरदान को फलीभूत करने की प्रार्थना की जिसके फलस्वरूप गांधारी ने गर्भधारण किया। चुकी, गांधारी को भगवन शिव से 100 पुत्र तथा एक कन्या का वरदान प्राप्त था, परन्तु गांधारी ने जन्म दिया मांस के टुकड़े को जिसे महर्षि वेदव्यास जी ने अपने तप और चमत्कारी शक्तियों के बल पर 100 टुकड़ों में विभक्त किया परन्तु वेदव्यास जी ने धृतराष्ट्र और गांधारी को पहले से ही अवगत करवा दिया की ये 100 पुत्र दैविक नहीं बल्कि आसुरी शक्तियां है पर धृतराष्ट्र अपने अहंकार में इतना डूबे हुए थे की संसार की चिंता न कर उन्होंने बस अपने ही बारे में सोचा और फिर ये 100 बालक ही ‘कौरव’ कहलाये और आगे चलकर इन्होंने अनगिनत पाप किये जिनमें माता द्रौपदी का चीरहरण सबसे दुखद घटना थी और अंत में महाभारत के युद्ध में ये सारे कौरव पांडवों के हाथों मारे गए।

विनाश काले विपरीत बुद्धि : निष्कर्ष


इस तरह से विनाश काले विपरीत बुद्धि, भाग्यवाद तथा कर्मवाद का सांमजस्य है। यदि इंसान अपने कर्मों को सुधार ले तो उससे नियति भी बदल सकती है परन्तु अपने विनाश को आता हुआ देख बड़े-बड़े योगी और भोगी भी अपनी बुद्धि, विवेक खो देते है और सत्य तथा सही रास्ते पर चलने के स्थान पर उलटे तथा उसके विपरीत रास्ते पर चलने लगते है।

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