You are currently viewing विद्या ददाति विनयम | Vidya Dadati Vinayam
विद्या ददाति विनयम | Vidya Dadati Vinayam

विद्या ददाति विनयम | Vidya Dadati Vinayam

विद्या ददाति विनयम एक संस्कृत श्लोक मात्र नहीं है, ये हमारे देश और हमारे ग्रंथो का परिचय भी है। हमारा देश बहुत सारे रीती रिवाजों के लिए जाना जाता है। भारत देश ऋषिमुनियों का देश है। यह देश ऋषि तथा देव ज्ञान पर आधारित है तथा यहाँ जीवन कला पद्धति भी धर्मशास्त्र ज्ञान के नीवं पर आधारित है। ऋषियों द्वारा दिए गए अनगिनत श्लोकों में से एक श्लोक पर आज हम विस्तार से प्रकाश डालेंगे। आज हम बात करेंगे हमारे देश के सर्वोपरी सांस्कृतिक श्लोकों में से एक श्लोक “विद्या ददाति विनयम” की। हमारे ग्रंथो में लिखी ये सांस्कृतिक श्लोक हमे बहुत कुछ समझाना तथा सीखलाना चाहती है, तो आइये, “विद्या ददाति विनयम” से जुड़ी कुछ आवश्यक तथा रोचक तथ्यों को जान लेते है:  

विद्या ददाति विनयम अर्थ

यह वाक्य उपनिषद की देन है, विद्या ददाति विनयम से तात्पर्य है कि विद्यावान इंसान में विनय होता है अर्थात उसमे विनम्रता अथवा नरमी होती है। आसान शब्दों में हम कह सकते है कि जिस इंसान के पास विद्या है वही विनम्र है और वही झुकना भी जानता है, आपको उसके अंदर अहंकार बिलकुल भी नहीं दिख सकता, जैसे कि आप किसी फलदार वृक्ष को ही देख लीजिये, वृक्ष पर लगे फल इंसान के अंदर उपस्थित विद्या, ज्ञान, बुद्धि, परोपकार, और सहनशीलता का प्रतीक है|

वृक्ष पर जितना ज्यादा फल लगते है, वृक्ष की डालियाँ उन फलों के भार से झुक जाती है, वैसे ही विद्यावान इंसान अपने विद्या और ज्ञान से सर्वथा विनम्र रहकर अहंकार से दूर रहता है। और सबके सामने बहुत ही नरमी से पेश आता है और सबका आदर करता है तथा अवसर आने पर फलों से लड़ी डालियों के समान झुकना भी जानता है।  परन्तु यहाँ जिस विद्या का उल्लेख किया गया है वह कोई किताबी ज्ञान नहीं बल्कि हमारी सनातन जीवन पद्धति पर आधारित, हमारे धर्मशास्त्र का ज्ञान है। 

विद्या ददाति विनयम in English

आइये, अब हम जानते है विद्या ददाति विनयम का इंग्लिश में सही अर्थ :

This sentence is from 'Upanishad'. Here, Vidhya means "Knowledge". It is not the knowledge from any book. This knowledge is based on our eternal way of life, the knowledge of our theology. The knowledge that brings humility, making us disciplined. It is the knowledge of worthiness, and this worthiness provides us wealth, enrichment to render in the form of good deeds towards society. In simple words, we can say that the person who has the knowledge is the one who is humble, and who also knows how to bend to seek more and serve.

विद्या ददाति विनयम श्लोक

अगर हम बात करे विद्या ददाति विनयमके पूर्ण श्लोक की, तो यह श्लोक उपनिषद से ली गई है और संस्कृत भाषा में लिखी गई है जो इस प्रकार है:

। विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।

।। पात्रत्वाध्दनमाप्नोति धनाध्दर्मं ततः सुखम् ।।

संस्कृत भाषा में लिखी इस श्लोक में उल्लेखित “विद्या” शब्द से तात्पर्य है “शिक्षा” से, वह ज्ञान जो ऋषियों की देन है, वह शिक्षा जो हमारे धर्मशास्त्र पर आधारित है। यह शिक्षा मनुष्य को विनय अर्थात विनम्रता प्रदान करती है, और विनम्रता किसी भी मनुष्य को किसी कर्म के प्रति योग्य बनाता है, और जब मनुष्य योग्यता पा लेता है तो योग्यता पाकर मनुष्य अपने बलबूते पर धन भी प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है और इसके फलस्वरूप मनुष्य धार्मिक कार्यों को भी संपन्न करता है।  यही धार्मिक कार्य मनुष्य को परम आनंद की प्राप्ति करवाता है। इस श्लोक का सही अर्थ यह है कि मनुष्य को सर्वथा ही उचित और सर्वोत्तम कार्य ही करने चाहिए तभी उचित सुख की भी प्राप्ति होगी। इसका मूल अर्थ यह है कि मनुष्य को शिक्षित और ज्ञानवान तथा विवेकवान होने की बहुत ही ज्यादा आवश्यकता है ।

विद्या ददाति विनयम लोगो

आज हम आपका विद्या ददाति विनयम के लोगो से परिचय करवाते है :

विद्या ददाति विनयम पर निबंध

विद्या ददाति विनयम का अर्थ तो आपको ज्ञात हो गया कि उसमे कहा गया है विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से हम योग्य अथवा काबिल बनते है। हम योग्य बनकर किसी भी कार्य को सिद्ध करते है तथा अपने बलबूते पर हम धन भी अर्जित कर लेते है फिर उस धन से हम धार्मिक कार्य भी सम्पन्न करते है, जो स्वयं में एक धर्म है और इस धर्म के पालन करने से हमे असीम सुख की प्राप्ति होती है। भारतवर्ष के पुराने गुरु, महात्मा तथा ऋषिमुनियों के अनुसार “विद्या” प्राप्ति का उद्देश्य केवल किताबी तथा मौखिक ज्ञान हाशिल करना नहीं है बल्कि अपने अंतर्निहित सम्पूर्णता को सही से व्यक्त करना है।

धर्मशास्त्र तथा उचित इंसान से मिली विद्या हमे विनय देती है, उस विनय से हमारे व्यक्तित्व अथवा हमारी पात्रता का विकास होता है और उसी पात्रता के माध्यम से हम हर एक चीज यथासंभव हासिल कर ही लेते है।  यहाँ विद्या का तात्पर्य किसी किताबी भाषा या ऊँची – ऊँची डिग्रियां हासिल करने से नहीं है अपितु विद्या प्राप्ति का सही अर्थ मनुष्य के अंतःकरण में विनय अर्थात शील को जन्म देना है।  परन्तु आज कल बस लोग किताबी ज्ञान हासिल कर रहे है जिससे की कितने भी पढ़े लिखे लोग क्यों न हो उनमे सदैव बुद्धि तथा विवेक का अभाव होने के कारण अहंकार की उत्पत्ति हो जाती है, जहाँ विनय का बसेरा होना चाहिए था, और दुर्भाग्यवश यह बहुत बड़े चिंता की विषय भी है। 

आज के समय में लोग जिसे विद्या कह कर सम्बोधित करते है वह विद्या नहीं बल्कि मात्र एक सुचना का माध्यम बन गया है। अगर हम बात करे कि विद्या को हमने सूचना का माध्यम कैसे कहा तो, सूचनाएं संवाद तथा पुस्तकों के माध्यम से प्राप्त हो जाय करती है परन्तु आप उसमे विवेक का प्रकाश कहाँ से पाएंगे? वह तो मनुष्यों में अन्तर्निहित है, जिसे मनुष्यों को स्वयं जागृत करना पड़ता है। और विवेक की रौशनी किसी पुस्तकालय अथवा कोचिंग संस्था से प्राप्त नहीं होती, ये तो अच्छे गुरु, अच्छे संस्कार तथा धर्मशास्त्रों से ही उत्पन्न होती है ।

विवेक की रौशनी की पहली किरण हमे जन्म के उपरान्त अपने माता तथा पिता से प्राप्त होती है इसीलिए माता-पिता को सबसे पहले और सर्वश्रेष्ठ गुरु कहते है।  माता पिता की दी गई संस्कार ही विद्या की नीवं है। मनुष्य जीवन में संस्कारों का बहुत बड़ा महत्व है, परन्तु ये संस्कार मनुष्य को कोई किताब या कोचिंग संस्था नहीं पढ़ा सकता, ये तो सिर्फ माता और पिता ही अपने बच्चो को दे सकते है। यह बहुत ही गर्व की बात है कि हमारी सनातन जीवन जीने की कला पद्धति पूर्ण रूप से संस्कारों पर आधारित है, और ये जीवन कला पद्धति पूरे संसार में सबसे उचित तथा अनूठी जीवन कला पद्धति है।      

क्या आपने कभी सुना है – “प्रेमः पुमर्थो महान्?, यह बात और कहीं नहीं बल्कि श्रीमद्भागवत ने, धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष, इनसब से ऊपर पंचम पुरूषार्थ की घोषणा की थी, वही तो है “प्रेमः पुमर्थो महान्। यहाँ प्रेम का तात्पर्य सच्ची भक्ति से है और यही भक्ति रूपी सघन अनुभूति का जब एक साधना के साथ साक्षात्कार हो जाता है तब विद्या का सही अर्थ स्वयं ही प्रकट हो जाता है। इसके पश्चात ही ह्रदय में पवित्रता का जन्म होगा और ह्रदय विशाल बनेगा और ऊँचे तथा सच्चे आदर्शों के प्रति हमारी सोच और रूचि बढ़ेगी और तभी तो हम प्रतिबद्ध भी होंगे, और तभी हम शिथिल भी होंगे।

इन सब के पश्चात ही हम जीवनमुक्त बनने में सक्षम बनेंगे। और इसके फलस्वरूप हमे ये पूरी सृष्टि बिल्कुल अपनी सी लगने लगेगी और तभी हम सम्पूर्ण भी होंगे। इस संसार में सिर्फ विद्या ही तो है जो पूर्णता देती है, ऐसा हमेशा से होता आया है, अब भी हो रहा है और निसंदेह आगे भी यही होगा। यदि हम पुरानी भारतीय इतिहास के वैदिक कालखंड को देखेंगे तो पाएंगे ऐसे बहुत सारे जीवन मुक्तों की अविरल पंरपरा के निशब्द कर देने वाले दर्शन मौजूद है। और ये जीवन मुक्ति देने वाली और कोई नहीं जीवन दायनी “विद्या” है।     

हमारे वेद तथा धर्मशास्त्र, भारतवर्ष के पुराने ऋषिमुनियों तथा देवताओं की भाषा है, उन्ही धर्मशास्त्र में कहीं गयी है की मनुष्य की प्रारम्भिक विद्या अर्थात जीवन के प्रारम्भिक समय में जो शिक्षा मनुष्य को प्राप्त हो, वो ऋषियों द्वारा दिए गए ज्ञान अथवा माता तथा पिता द्वारा दिए गए संस्कार ही होने चाहिए, कोई किताबी ज्ञान नहीं होना चाहिए। किताबी ज्ञान द्वारा मनुष्य बस अहंकार को दिखाने लायक डिग्रीयाँ ही हासिल कर सकता है परन्तु उसमे विवेक का अभाव हमेशा ही रहेगा।

इसलिए ऋषिमुनियों के द्वारा दी गई शिक्षा तथा माता पिता के द्वारा दिए गए संस्कार से इंसान के अंदर नम्रता अथवा नरमी आती है और इसी नम्रता के आधार पर मनुष्य काबिल बनता है और अपने योग्यता के दम पर मनुष्य किसी कार्य को पूरा करने का साहस भी पाता है और उसे पूरा भी करता है। उचित कार्य को पूरा कर के मनुष्य के जिंदिगी में धनागमन होता है और धन को पाकर मनुष्य की ये जिम्मेदारी है की मनुष्य उस धन को धर्म के रास्ते पर ही व्यय करे। फिर मनुष्य सही कर्मों से प्राप्त किये गए धन को धर्म से जुड़ें कार्य तथा धार्मिक कार्य में खर्च करता है, और इससे मनुष्य को असीम सुख की प्राप्ति भी होती है और मनुष्य एक सफल जीवन को भी प्राप्त कर लेता है।    

courtesy: Google images

Leave a Reply