You are currently viewing वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam
वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam

वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam

वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam भारतीय सभ्यता के आदर्शों की महानतम अभिव्यक्ति है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इस वाक्य के अर्थ में  विश्व में सह-अस्तित्व, सहानुभूति और परस्परिक विकास का सूत्र मनुष्यों के समक्ष प्रस्तुत किया है।

वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam

वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam श्लोक अपने अर्थों में संघर्ष और पृथकता की भावना का त्याग कर, एक-दूसरे से सहयोग का मार्ग प्रशस्त करता है। वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam श्लोक की ख्याति और प्रासांगिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत की संसद के प्रवेश हॉल में भी इस श्लोक को बड़ी सुंदरता से उकेरा गया है।

आइए वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam का अर्थ, उत्पत्ति, और इसके भगवद्गीता से संबंध का अवलोकन करते हैं। साथ-ही इसके लोगो और पूर्ण श्लोक को भी समझते हैं।

वसुधैव कुटुम्बकम का अर्थ | Vasudhaiva Kutumbakam meaning

वसुधैव कुटुम्बकम का अर्थ है-“धरती ही परिवार है” । किन्तु इस श्लोक का अर्थ बहुत व्यापक है। इसके सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, नैतिक, राजनैतिक, मानवीय, और दार्शनिक कई आयाम हैं।

संस्कृत: वसुधैव कुटुम्बकम, वसुधा=पृथ्वी; कुटुम्ब=परिवार

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् | उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ||  (महोपनिषद्, अध्याय 6, श्‍लोक ७१)

अर्थ – यह अपना है और यह अपना नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त (अथवा बुद्धि) वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।

English translation:

This is mine, that is his, say the small minded,

the wise believe that the entire world is a family.

इस श्लोक में भारतीय दर्शन और विचारधारा का उच्चतम आदर्श भरा हुआ है। यह श्लोक बताता है कि यह व्यक्ति अपना है और यह अपना नहीं है, ऐसी बुद्धि केवल छोटे चित्त वाले मनुष्य ही रखते हैं। जबकि उदार हृदय के ज्ञानी व्यक्ति पूरे विश्व को ही अपना परिवार मानते हैं। वे अपने-पराये की भावना से ऊपर होते हैं।

आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो इसका अर्थ भगवद्गीता में वर्णित निष्काम कर्मयोग से मेल खाता है। हमें अपने पराये का भेद किए बगैर सभी के कल्याण के लिए कर्म करना चाहिए। धर्म, जाति, भाषा, लिंग और समुदाय इत्यादि का भेदभाव केवल अज्ञानी ही करते हैं।

वसुधैव कुटुम्बकम के महत्वपूर्ण निहितार्थ:

  1. सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है।
  2. हमारे कर्म पृथक-पृथक होते हुए भी एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।
  3. सभी राष्ट्र और समुदाय सह-अस्तित्व के साथ परस्पर विकसित हो सकते हैं।
  4. हमें संघर्ष और प्रतिस्पर्धा के बदले एक-दूसरे के साथ सहानुभूति का व्यवहार करना होगा।
  5. पृथ्वी के सभी जीव एक दूसरे पर आश्रित हैं इसलिए पृथ्वी में संतुलन बनाए रखना परम आवश्यक है। पर्यावरण का संतुलन भी इसमें सम्मिलित है।
  6. बुद्धि केवल मनुष्यों के पास है इसलिए पृथ्वी की प्रक्रियाओं में संतुलन बनाए रखने का सबसे अधिक दायित्व मनुष्यों कों ही है।

वसुधैव कुटुम्बकम का पूर्ण श्लोक | Vasudhaiva Kutumbakam Sanskrit

विश्व-प्रसिद्ध “वसुधैव कुटुम्बकम” का पूर्ण श्लोक महा उपनिषद का है। यह महा उपनिषद के छठवें अध्याय का ७१वां श्लोक है। महा उपनिषद एक लघु उपनिषद है जो विष्णु-उपनिषद नाम के उपनिषदों के समूह के अंतर्गत आता है। यह पूर्ण श्लोक कुछ इस प्रकार है:

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् |

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् || 

(महोपनिषद्, अध्याय 6, श्‍लोक ७१);

किन्तु कहीं-कहीं यह श्लोक पूर्ण रूप में कुछ इस प्रकार भी दिया गया है:

अयं बन्धुरयंनेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

हालांकि दोनों श्लोकों का अर्थ और उनमें निहित भावना एक ही है। यह पूर्ण श्लोक महोपनिषद में वर्णित होने के साथ-साथ भारत के कई अन्य शास्त्रों में भी प्राप्त होता है।

वसुधैव कुटुम्बकम लोगो | Vasudhaiv Kutumbakam Logo

2023 में भारत पहली बार G-20 देशों के सम्मेलन की अध्यक्षता करने जा रहा है। भारत की G20 देशों के सम्मेलन की अध्‍यक्षता की थीम या विषय – “वसुधैव कुटुम्बकम” या “एक पृथ्वी · एक कुटुंब · एक भविष्य” (“One Earth · One Family · One Future” ) है।  यह थीम सभी प्रकार के जीवन मूल्यों – मानव, पशु, पौधे और सूक्ष्मजीव – और पृथ्वी एवं व्यापक ब्रह्मांड में उनके परस्पर संबंधों की पुष्टि करने की प्रतीक है।

इस अवसर पर वसुधैव कुटुम्बकम का लोगो भी G-20 के लिए तैयार किया गया है। यह लोगो भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे पर आधारित है जिसमें केसरिया, सफेद, हरे, एवं नीले रंगों का प्रयोग किया गया है। इस लोगो में भारत के राष्ट्रीय पुष्प कमल को पृथ्वी के साथ चित्रित किया गया है। यह विश्व में समकालीन चुनौतियों के बीच विकास की संभावनाओं को दर्शाता है।

 वसुधैव कुटुम्बकम का लोगो (G-20 Presidency India। 2023)

वसुधैव कुटुम्बकम उत्पत्ति | Vasudhaiva Kutumbakam origin

वसुधैव कुटुम्बकम उत्पत्ति | Vasudhaiva Kutumbakam origin भारतीय ऋषि-मुनियों के विचारों से हुई है। यह सनातन मनीषियों की सार्वभौमिक और सर्व जन सुखाय के दर्शन की देन है। हालांकि यह कहना कठिन है कि इस महावाक्य का सबसे पहले कब और किसने प्रयोग किया था। संस्कृत भाषा के शास्त्रीय प्रमाणों में सर्वप्रथम यह श्लोक महा उपनिषद के छठवें अध्याय में वर्णित मिलता है।

यह वाक्य दो शब्दों ‘वसुधा’ और ‘कुटुंब’ से मिलकर बना है। ‘वसुधा’ का अर्थ है पृथ्वी और ‘कुटुम्ब’ का अर्थ है परिवार अर्थात सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है। पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्य और जड़-चेतन एक ही परिवार का हिस्सा हैं और एक दूसरे पर निर्भर हैं।

चूंकि समुर्ण विश्व के मनुष्य एक ही परिवार के सदस्य हैं इसलिए हमें एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा नहीं परस्पर सहानुभूति होनी चाहिए। विश्व के सभी राष्ट्रों को अपने विकास में अन्य देशों को भी सहभागी बनाना चाहिए। मानव के इसी परस्परिक विकास की अवधारणा की संकल्पना भारत के प्राचीन बुद्धिजीवियों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के रूप में की थी। यही इस महावाक्य का वास्तविक अर्थ भी है।

 सनातन धर्म की जिस विचारधारा ने सभी मनुष्यों में एकता का संदेश दिया, उसी विचारधारा ने आगे चलकर ‘तत् त्वं असि’ जैसे महान लक्ष्य को भी मानव जाति के समक्ष प्रस्तुत किया। यह दर्शन बताता है कि पृथ्वी ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड सहित सभी जड़-चेतन एक सर्वशक्तिमान ईश्वर से ही उद्भूत हुए हैं।

इसी विचारधारा ने मनुष्य के व्यवहार को एकाँकी न मानकर उसे विश्व के कल्याण के लिए प्रेरित किया, जिसकी परिणति ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसे सूत्र में हुई है।

हालांकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना की उत्पत्ति वेदों के ज्ञानकांड की देन है किन्तु यह भारतियों के दैनिक कर्मकांड में भी निरंतर अभिव्यक्त होती रही है। यही कारण ही कि भारतीय शास्त्र मानव को एक-दूसरे पर आश्रित मानते हुए उन्हे सामाजिक रूप से विकसित होने की बात करते हैं।

भारतीयों ने केवल ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसा महान आदर्श प्रस्तुत करके हाथ-खड़े नहीं किए। वे कुछ और आगे निकल गए और एक नया सूत्र दिया-लोकाःसमस्ताः सुखिनो भवन्तु। अर्थात सभी लोक सुखी रहें। वर्तमान संदर्भ में इसे ‘संसार सुखी रहे’ के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

वसुधैव कुटुम्बकम की उत्पत्ति भारतीय विचारधारा की इसी महान परंपरा की परिणति है।

वसुधैव कुटुम्बकम गीता | Vasudhaiva Kutumbakam in Gita

भगवद्गीता में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना सर्वत्र दिखाई देती है। वास्तव में इस विचार की यदि किसी ने सही से व्याख्या की है तो वह श्री कृष्ण ही हैं। गीता सर्व धर्म समन्वय का उपदेश देती है।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अपने कर्म सभी भेदों, भावनाओं और द्वन्द्वों से रहित होकर करने की शिक्षा दी है। गीता के चौथे अध्याय में कृष्ण ने अपना-पराया की भावना से परे होकर कर्म करने वाले को समदर्शी कहा है।

वे इस प्रकार से किए गए  निष्काम कर्मयोग को ही श्रेष्ठ बताते हैं। वास्तव में गीता में बताए गए कर्मयोग में द्वैत की सभी भावनाओं से मुक्त होने की बात कही गई है।

यही विश्व-स्तर पर जब क्रियान्वित होता है तो संसार के कल्याण के साथ ही आत्मकल्याण भी जुड़ जाता है। तब सम्पूर्ण विश्व में कोई पराया नहीं रह जाता। यही आदर्श ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ में भी निहित है।

अर्थात हम एकांगी न होकर समष्टि के कल्याण के लिए प्रयासरत रहें। क्योंकि हमारे सभी कर्म व्यक्तिगत न होकर अन्य मनुष्यों को प्रभावित भी करने की क्षमता रखते हैं। हमारा मोक्ष जगत के हित के साथ जुड़ा हुआ है।

वसुधैव कुटुम्बकम निबंध | Vasudhaiva Kutumbakam essay

भारतीय संस्कृति और विचारधारा ने प्राचीनकाल से ही विश्व की सभी सभ्यताओं को प्रभावित किया है। यह प्रभाव ना सिर्फ आध्यात्मिक रहा है बल्कि भौतिक जगत में भी इसे महसूस किया जाता रहा है। किन्तु पाश्चात्य समेत विश्व के अन्य देशों पर जो सबसे गहरा और स्पष्ट दीर्घकालीन प्रभाव दिखाई देता है, वह है वसुधैव कुटुम्बकम की विचारधारा और आध्यात्मिक ज्ञान का जिसमें योग भी सम्मिलित है।

वसुधैव कुटुम्बकम संस्कृत भाषा के सबसे विख्यात वाक्यों में से एक है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया है। इसका अर्थ अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग किया जाता रहा है जो लगभग सभी मान्य हैं। इसका सीधा-साधा अर्थ है-सारा विश्व एक परिवार है, किन्तु इस अर्थ के मायने भिन्न हैं।

हमने विश्व के समक्ष न सिर्फ सभी मनुष्यों की एकता और सहानुभूति का सिद्धान्त रखा है बल्कि यह महान घोषणा भी की है कि सभी एक ही ब्रह्म से निकले हैं और अंत में सभी उसी ब्रह्म रूपी शक्ति में समाहित हो जाते हैं। इसलिए आध्यात्मिक रूप से कोई भिन्नता नहीं है। 

यह वाक्य उस महान भारतीय विचारधारा का अंग है जो मनुष्य के समावेशी विकास और सामाजिक दृष्टिकोण का परिचायक है। यह वर्तमान युग में वैश्विक संघर्षों को कम करने में प्रासंगिक और प्रभावी बना हुआ है। यह सूत्र स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि हमारा भाग्य भी एक साथ जुड़ा है।

विश्व के लिए प्रत्येक देश का दृष्टिकोण ऐतिहासिक रूप से उसकी सभ्यता और दार्शनिक विरासत से प्रेरणा पाता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जैसे आदर्शों के कारण ही भारत पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखता है।

अनेकता में भी एकता का संदर्भ लिए यह वाक्य विश्व के सभी राष्ट्रों और भिन्न-भिन्न सभ्यताओं को मानो यह संदेश देता है कि आपके निर्णय और कर्म, केवल आप तक सीमित नहीं हैं। हम सभी एक दूसरे को प्रभावित करते हैं और एक दूसरे से प्रभावित भी होते हैं। हमारा भविष्य भी एक दूसरे से जुड़ा हुआ है।

वर्तमान परिस्थितियों में किसी एक देश द्वारा उठाए कदमों के परिणाम विश्व के सभी देशों को भुगतने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए किसी देश में औद्योगिक विकास के परिणामस्वरूप होने वाले वायु प्रदूषण से पूरा वायुमंडल प्रदूषित होता है।

भारतीय लोक-परम्पराओं और सभ्यता का इतिहास पाँच हज़ार सालों से भी ज्यादा पुराना है। यह विश्व की सबसे पुरानी और विकसित सभ्यता है। उपनिषदों में विकसित हुए उच्च आध्यात्मिक ज्ञान और वेदों के ब्राह्मण ग्रन्थों में विकसित हुए कर्मकांड की एक अनवरत शृंखला चली आ रही है।

इसी का उदाहरण है हमारी संसद में उकेरा गया वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam का महावाक्य जो भारत के भविष्य का निर्माण करने वाले राजर्षियों को विश्व-बंधुता और विकास के लिए कर्म करने की प्रेरणा देता रहता है। अहिंसा परमो धर्म और सर्वे भवन्तु सुखिनः

समय-समय पर भारत की विदेश नीति में भी इस विचाधारा को अभिव्यक्ति मिलती रहती है। राजीव गांधी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने अपने दृष्टिकोण को सामने रखने के लिए इस वाक्य का प्रयोग किया है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के सितंबर 2014 के सत्र में भाग लेते हुए, कहा था कि भारत की विदेश नीति वसुधैव कुटुम्बकम | Vasudhaiva Kutumbakam (विश्व एक परिवार है) के पुराने आदर्श द्वारा निर्देशित है।

हमें यह भी समझना होगा कि इस सूत्र के दार्शनिक आयामों के अलावा, विशेष रूप से आज की विश्व व्यवस्था में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के रणनीतिक निहितार्थ क्या हैं? एकीकरण के कारण बढ़ते संघर्षों या सीमाओं के पार अवैध प्रवासन जैसे उदाहरणों में हम इसका कैसे उपयोग कर सकते हैं? किसी व्यक्ति के जीवन या समाज पर इसके नैतिक प्रभाव क्या हैं?

विश्व एक कुटुंब की तरह है। किन्तु यह कुटुम्ब तभी स्वस्थ्य रहेगा जब इसमें संतुलन बना रहेगा। इस संतुलन को बनाए रखने के लिए भूमि, वायु, जल, और पर्यावरण को स्वस्थ्य रखने के लिए सम्मिलित रूप से प्रयास करने की आवश्यकता है।

इस भावना को मूर्त रूप देने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने कई प्रयास किए हैं। राष्ट्रों को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़कर पहल भी करनी होगी ताकि हम एक ऐसी वसुधा अगली पीढ़ी के लिए छोड़ जाए जो उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हो।

यद्यपि वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा प्राचीन है किन्तु 21वीं शताब्दी में यह पहले से भी ज्यादा प्रासंगिक दिखाई देती है।

Leave a Reply