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बुद्ध पूर्णिमा |Buddha Purnima

बुद्ध पूर्णिमा |Buddha Purnima

बौद्ध धर्म अनुयायियों के लिए सबसे ख़ास त्यौहार है बुद्ध पूर्णिमा। धर्मशास्त्र के अनुसार बैशाख के महीने में पड़ने वाली पूर्णिमा के दिन ही भगवान गौतम बुद्ध का जन्म ,ज्ञान की प्राप्ति तथा महापरिनिर्वाण- तीनो महानतम घटनाये एक ही दिन हुई थी | इसीलिए बैशाख में पड़ने वाली पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के नाम से सम्बोधित किया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा को ‘वेसक’ तथा ‘हनमतसूरी’ के नाम से भी जाना जाता है । बुद्ध पूर्णिमा, पूरी तरह से ही भगवान गौतम बुद्ध को समर्पित है।

यह त्यौहार जितना बौद्ध धर्म के लोगो के लिए ख़ास है उतना ही ख़ास हिन्दू धर्म के लोगो के लिए भी है। हिन्दू धर्म के लोगो के लिए बुद्ध पूर्णिमा  के खास होने के पीछे, एक कारण भी है, हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवन गौतम बुद्ध, भगवान विष्णु के ही अवतारों में से एक है । इसी कारण वश, बुद्ध पूर्णिमा के दिन, न की सिर्फ भगवान गौतम बुद्ध के सामने पूजा – प्रार्थना की जाती है बल्कि भगवान विष्णु की भी पूजा – अर्चना की जाती है।  श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ बुद्ध पूर्णिमा के दिन भगवान गौतम बुद्ध तथा भगवान विष्णु की पूजा करते है । हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, बुद्ध पूर्णिमा के पवित्र दिन, जो कोई भी सच्चे मन से व्रत अथवा उपवास करता है, उसकी आर्थिक परेशानी जल्द से जल्द दूर हो जाती है तथा मनचाही इच्छा भी पूर्ण होती है।   

तो आइये जानते है आखिर क्या है इस पावन, पवित्र व्रत बुद्ध पूर्णिमा की कथा:

बुद्ध पूर्णिमा कथा

गौतम बुद्ध का जन्म बैशाख के पूर्णिमा के दिन नेपाल के लुंबनी वन में हुआ था । गौतम बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ, कपिलवस्तु के महाराज शुद्धोधन के पुत्र थे।  कुछ समय उपरान्त राजकुमार सिद्धार्थ थोड़े बड़े हुए और घूमने का मन बनाकर अपने रथ पर सवार होकर अपने बगीचे के तरफ निकल पड़े।  सिद्धार्थ ने देखा की कुछ ही दूरी पर कुछ लोग किसी मुर्दे को उठाकर ले जा रहे है, उस मुर्दे के शरीर को कपडे से लपेटा गया था तथा डोरियों से बाँधा गया था।  उस मुर्दे के परिवार जन बहुत जोर – जोर से रो रहे थे।  मुर्दे की माँ और बहन का रो रोकर बहुत ही बुरा हाल हो गया था तथा उसकी पत्नी तो बिचारि छाती पिट – पिट कर रो रही थी। यह सब देख राजकुमार सिद्धार्थ क्षुब्ध हो उठे और उन्होंने अपने सारथी से यह सब चीजों के होने का कारण पूछा।  सारथी ने राजकुमार सिद्धार्थ से कहा कि जिसे कपड़े में लपेटकर और डोरियों से बांधकर चार व्यक्ति कंधे पर उठाकर ले जा रहें है, उसकी मृत्यु हो गई है। जो लोग रो रहे है वो सब मृत व्यक्ति के सम्बन्धी है तथा इसे श्मशान में ले जाकर इसका दाह संस्कार कर दिया जायेगा। 

सारथी के मुख से यह सब सुनकर राजकुमार सिद्धार्थ के मुख पर गहरी उदासी छा गई। 

और राजकुमार सिद्धार्थ ने सारथी से पूछा कि “इसकी मृत्यु क्यूँ हुई?” 

सारथी ने राजकुमार सिद्धार्थ से कहा “एक न एक दिन तो सबकी मृत्यु निश्चित है, मृत्यु से आज तक कौन बच पाया है?”

राजकुमार सिद्धार्थ ने सारथी को आज्ञा दी “रथ को वापस महल ले जाने की”। महाराज शुद्धोधन ने सारथी से रथ जल्दी वापस लाने के लिए कारण पूछा और सारथी ने महाराज से सारी बातें बता दी। 

महाराज शुद्धोधन ने महल के चारों तरफ पहरा और बढ़ा दिया ताकि राजकुमार सिद्धार्थ को इस तरह के दृश्य न दिखे। कुछ समय उपरान्त, राजकुमार सिद्धार्थ बड़े हो गए और अगली बार राजकुमार सिद्धार्थ फिर से रथ पर सवार होकर बगीचे की सैर पर निकले और इसबार राजकुमार सिद्धार्थ ने गेरुवा वस्त्र पहने एक सन्याशी को देखा । उस सन्याशी के चेहरे पर दिव्य चमक थी और वो सन्याशी अपने ही धुन में मग्न होकर चले रहा था। 

यह देख राजकुमार सिद्धार्थ के मन में सवाल उठा, उन्होंने सारथी से प्रश्न किया “यह कौन जा रहा  है? “

सारथी ने राजकुमार सिद्धार्थ से कहा यह एक सन्याशी है, इसने अपने हर एक सगे सम्बन्धी से नाता तोड़ लिया है और अपना नाता ईश्वर से जोड़ लिया है।   

उस दिन राजकुमार सिद्धार्थ ने पूरे बगीचे की सैर की और वापस महल आकर राजकुमार सिद्धार्थ यह सोचने लगे की बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु से छुटकारा कैसे संभव है?

आखिर क्या उपाय है इन दुखो से बचने का इनसे दूर जाने का? आखिर मुझे अब क्या करना चाहिए? मैं भी क्यूँ न उस सन्याशी के जैसा ही बन जाऊ?

इन्हीं दिनों के मध्य राजकुमार सिद्धार्थ की धर्मपत्नी यशोधरा ने एक पुत्र को भी जन्म दिया।  महाराज शुद्धोधन को जैसे ही अपने पौत्र के जन्म का शुभ समाचार प्राप्त हुआ, वह बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने दान – दक्षिणा देना शुरू कर दिया तथा उन्होंने अपने पौत्र का नाम ‘राहुल’ रखा।  कुछ समय उपरान्त, राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने कुल – परिवार तथा अपने महल को त्यागने का मन बना लिया और द्वार पर जाकर राजकुमार सिद्धार्थ ने पहरेदार से प्रश्न किया, “तुम कौन हो”? 

पहरेदार ने राजकुमार सिद्धार्थ से कहा, “मैं छंदक हूँ”, राजकुमार सिद्धार्थ ने छंदक को आज्ञा दी, “एक घोडा ले आओ”।

छंदक ने कहा “जो आज्ञा”, और छंदक घोडा लेने के लिए चला गया।

राजकुमार सिद्धार्थ के मन में पुत्र का मोह उठा और उन्होंने सोचा कि सदा के लिए मैं अपने कुल और महल को त्याग रहा हूँ, क्यूँ न मैं अपने पुत्र को अंतिम बार देख आऊ और राजकुमार सिद्धार्थ यशोधरा के कक्ष में जा खड़े हुए। यशोधरा अपने शिशु को लिए हुए सो रही थी। तब राजकुमार सिद्धार्थ ने सोचा के अभी अगर मैं पुत्र को देखने जाऊ तो यशोधरा स्वतः उठ जायेगी, इसलिए अभी चला जाता हूँ और जब मैं अपने ज्ञान को हासिल कर लूँगा तब वापस आकर अपने पुत्र को देख लूँगा।   

‘कंथक” नाम का सफ़ेद रंग के घोड़े को छंदक बहुत ही सुन्दर तरह से साज सवारकर ले आया। राजकुमार सिद्धार्थ घोड़े पर सवार होकर महल से निकल गए।  उस रात को ही राजकुमार सिद्धार्थ अपने और अपने मामा के राजधानी की सीमा को पार कर गए और रामग्राम की सीमा पार कर एक नदी के तट पर पहुंचे जिसका नाम “अनिमा” था। उस नदी को पार कर राजकुमार सिद्धार्थ एक रेतीले तट पर पहुंचे और उन्होंने छंदक से कहा, “छंदक मैं तो सन्याशी बनने जा रहा हूँ, तुम कृपया मेरे गहनों और इस घोड़े को लेकर वापस महल चले जाओ”, राजकुमार सिद्धार्थ कि बात सुनकर छंदक ने कहा मैं भी सन्याशी बनूँगा परन्तु राजकुमार सिद्धार्थ ने छंदक को फिर से वापस लौट जाने को कहा, और अपनी तलवार निकाल कर राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने केशो को काट डाला।  इसके पश्चात एक सन्याशी के वेश में राजकुमार सिद्धार्थ राजगृह पहुंचे और भिक्षा मांगने के लिए निकल पड़े।  नगर में इस सुन्दर युवक भिक्षु के आने का समाचार नगर के राजा को भी प्राप्त हुआ और राजा इस सुन्दर से भिक्षु के पास आये और उन्होंने इस सुन्दर से भिक्षु अथवा सन्याशी से मनचाही वस्तु मांगने का आग्रह किया।    

युवा सन्याशी ने राजा को उत्तर दिया और कहा कि ” महाराज मैं तो किसी चीज को पाने की इच्छा से नहीं आया हूँ, ये सारी सुख सुविधा तो मेरे महल में भी उपलब्ध है। मैं तो यहाँ ज्ञान प्राप्ति के लिए आया हूँ। “

सन्याशी की बात सुनकर राजा अचंभित रह गए और राजा ने सन्याशी से कहा कि आपको सफलता अवश्य प्राप्त होगी। परन्तु मैं ये निवेदन करता हूँ कि जब आपको दिव्य अर्थात परम ज्ञान कि प्राप्ति हो जायेगी तब आप सर्वप्रथम मेरे राज्य में ही आइयेगा ।

बहुत दिनों तक तो राजकुमार सिद्धार्थ सन्याशी बनकर इधर – उधर भटकते रहे फिर पहुंचे उरुबेल और कठिन तपस्या आरम्भ कर दी।  और भी पांच लोग जिनमे से एक कौडिन्य नाम का व्यक्ति भी भिक्षुक बनकर सन्याशी के साथ ही उरुबेल में रहने लगा। सन्याशी कठिन तपस्या में लीन होकर, भोजन और जल को भी त्याग दिए और उनका सुन्दर सा देह भी काला पड़ गया। और एक दिन वो चक्कर खाकर गिर पड़े तब सन्याशी ने सोचा कि आखिर इस शरीर को गला कर मुझे क्या प्राप्त होगा इसलिए उन्होंने भिक्षा माँगना फिर से आरम्भ कर दिया । ये सब देखकर सन्याशी के साथ रहने वाले पांचो भिक्षुक ने सोचा कि अब सन्याशी की तपस्या भंग हो गई, तो अब सन्याशी को ज्ञान कैसे प्राप्त होगी।  यही सोचकर सन्याशी को पांचो भिक्षुक छोड़कर चले गए ।

कुछ समय उपरान्त बैशाख माह के पूर्णिमा के दिन, सन्याशी बोधि नामक वृक्ष के निचे तपस्या कर रहे थे।  और पास ही के गांव की एक स्त्री सुजाता, सन्याशी के लिए खीर लेकर आई जिसे खाकर सन्याशी के शरीर में ताकत आने लगी । छह वर्षों की तपस्या के पश्चात राजकुमार सिद्धार्थ को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई। और वो “बुद्ध” कहलाये जिसका शाब्दिक अर्थ है जिसे ज्ञान का बोध हो गया हो । और इसके पश्चात भगवान गौतम बुद्ध की सारी इच्छाएं भी समाप्त हो गई।    

बुद्ध पूर्णिमा कब है

इस वर्ष 2021 में बुद्ध पूर्णिमा की तिथि : 26th मई 2021, बुद्धवार

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ होने का समय= 25th मई 2021, रात्रि 08:20

पूर्णिमा तिथि समापन का समय = 26th मई 2021, शाम 04:40

बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं

इस वर्ष पड़ने वाली बुद्ध पूर्णिमा की आप सब को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। 

|| “सुख” और “दुख” जीवन के “रंग” है ||,

|| सब सही है अगर “श्रद्धा” संग है ||

|| “भगवान बुद्ध” के ध्यान में “मलंग” है ||

|| “हैप्पी बुद्ध जयंती” कहने का ये नया “ढंग” है ||

||”बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं”||

बुद्ध पूर्णिमा सन्देश

बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर आपके लिए, भगवान बुद्ध के द्वारा दिए गए सन्देश

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  1. जीवन में स्वयं पर विजय प्राप्त करना हजारों लड़ाइयां जीतने से बेहतर है। यदि ये कर लिया आपने तो फिर जीत हमेशा आपकी होगी, इसे आपसे कोई नहीं छीन सकता ।
  2. सूर्य, चन्द्रमा और सत्य – किसी भी हालात में, इन तीन चीजों को कभी भी नहीं छुपाया जा सकता है। 
  3. जीवन में किसी उद्देश्य या लक्ष्य तक पहुँचने से ज्यादा महत्वपूर्ण उस यात्रा को अच्छे से सफल बनाना होता है।
  4. बुराई को बुराई से ही समाप्त नहीं किया जा सकता तथा घृणा को सिर्फ प्रेम द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है और यह एक अटूट सत्य है।  
  5. सत्य के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति केवल दो ही गलतियाँ कर सकता है, पहली गलति या तो पूरा रास्ता तय ना करना और दूसरी, या फिर शुरुआत ही ना करना ।
  6. भविष्य की चिंता मत करो और अतीत में मत उलझे रहो, सिर्फ वर्तमान पर ही ध्यान दो।  जीवन में खुश रहने का यही एक सही और सरल रास्ता है। 
  7. खुशियाँ हमेशा बाँटने से बढ़ती हैं जैसे कि एक जलते हुए दीये से हजारों दीपक रोशन किए जा सकते है, फिर भी उस दीये की रोशनी कम नहीं होती। 
  8. आप चाहें कितनी भी अच्छी किताबें पढ़ लें, कितने भी अच्छे शब्द सुन लें, लेकिन जब तक आप उन्हें अपने जीवन में नहीं अपनाते तब तक आपको उसका कोई फायदा नहीं होगा ।
  9. हमेशा क्रोध में रहना, ठीक उसी तरह है जैसे किसी जलते हुए कोयले को किसी दूसरे व्यक्ति पर फेंकने की इच्छा से खुद पकड़ कर रखना और यह क्रोध सबसे पहले आपको ही जलायेगा ।
  10. क्रोध में आकर हजारों अप्शब्द बोलने से अच्छा, मौन का वह एक शब्द है जो जीवन में शांति लाता है। 

बुद्ध पूर्णिमा का महत्व 

हिन्दू धर्मशास्त्र और मान्यताओं के आधार पर भगवान गौतम बुद्ध को, भगवान विष्णु का नौवा अवतार माना जाता है।  इस पवित्र दिन, बहुत सारे पूजा – पाठ तथा गीत समारोह का आयोजन होता है। चूँकि, बौद्ध धर्म के अनुयायियों का एक पावन पर्व है इसलिए बुद्ध पूर्णिमा के दिन बौद्ध धर्म के लोग अपने घरों में दिए प्रकाशित करते है तथा इस दिन स्नान आदि करके दान पुण्य भी करते है । मान्यता है कि बुद्ध पूर्णिमा के दिन मिष्ठान, जलपात्र, वस्त्र तथा सत्तू दान दिया जाता है।  तथा बुद्ध पूर्णिमा के दिन पितृों का तर्पण करना अत्यधिक पुण्य की प्राप्ति करवाता है।   

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