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प्रदोष व्रत कब है?

प्रदोष व्रत कब है?

प्रदोष व्रत कब है? इस हेतु प्रदोष व्रत की तिथियों का ज्ञान आवश्यक है | प्रदोष व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके सभी मनोरथ पूरे होते हैं।

प्रदोष व्रत

प्रदोषो रजनी-मुखम” अर्थात सांयकाल के बाद और रात्रि से पहले, दोनों के मध्य का जो समय है, उसे प्रदोष कहते हैं। उसी समय प्रदोष का व्रत करने वाले को भगवान शंकर का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए।

भगवान शिव-शंकर बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देव हैं। उन्हे प्रदोष व्रत अत्यंत प्रिय है। इसलिए इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी दोष तुरंत ही खत्म हो जाते हैं और शिव कृपा प्राप्त होती है।

आइए जानते हैं कि प्रदोष व्रत कब किया जाता है और इस व्रत को करने का विधान क्या है तथा प्रदोष व्रत का उद्यापन कैसे और कब करें।

प्रदोष व्रत कब है?

जब महीने की त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल में पड़े तो प्रदोष व्रत का विधान माना जाता है। यदि यह त्रयोदशी तिथि शुक्ल पक्ष में पड़े तो शुक्ल प्रदोष और कृष्ण पक्ष में पड़े तो कृष्ण प्रदोष के नाम से जाना जाता है। अर्थात प्रदोष व्रत शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों में किया जाता है।

यहाँ ध्यान देना चाहिए कि प्रदोष व्रत सूर्यास्त से कुछ समय पूर्व किया जाता है इसलिए अलग-अलग शहरों में इसका समय अलग-अलग हो सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त का समय अलग होता है।

प्रदोष काल सूर्यास्त से 45 मिनट पहले शुरू होकर सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक रहता है। प्रदोष व्रत त्रयोदशी के दिन ही इसलिए मनाया जाता है क्योंकि यह दिन भगवान शंकर को अत्यधिक प्रिय है। यहाँ ध्यान देने कि बात यह है कि सभी तिथियों की गणना हिन्दू वर्ष और माह तथा चंद्र आधारित कलेंडर के अनुसार ही करें।

प्रदोष व्रत एक महीने में दो बार पड़ता है। यानि अर्धमासिक होता है।

प्रदोष व्रत में वार परिचय

सप्ताह के अलग-अलग दिनों में पड़ने वाले प्रदोष व्रतों के नाम और उनके फल अलग-अलग होते हैं। सातों दिनों के प्रदोष व्रतों का परिचय यह है:

  1. रवि प्रदोष-यदि त्रयोदशी का दिन रविवार को पड़े तो रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। इसे करने से दीर्घ आयु और आरोग्यता का फल मिलता है।
  2. सोम प्रदोष-सोमवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोष कहा जाता है। इसे करने से मनुष्य को ग्रह दशा निवारण का फल मिलता है।
  3. मंगल प्रदोष व्रत-इस व्रत को करने वाला व्यक्ति रोगों से मुक्ति प्राप्त करता है और अच्छा स्वास्थ्य लाभ करता है।
  4. बुध प्रदोष व्रत-इस प्रदोषव्रतका लाभ है सर्वकामना सिद्धि।
  5. बृहस्पति प्रदोष-जिन लोगों के प्रबल शत्रु हैं और हमेशा शत्रु का भाय रहता है उन्हे बृहस्पति प्रदोष का व्रत करना चाहिए। इससे शत्रु विनाश होता है और भाय का नाश होता है।
  6. शुक्र प्रदोष-इसे करने वाले को सौभाग्य और स्त्रियों को समृद्धि प्राप्त होती है।
  7. शनि प्रदोष-इससे खोया हुआ राज्य और पद की प्राप्ति होती है।

प्रदोष व्रत की कथा और विधि

प्रदोष व्रत की पूजा विधि

प्रदोष व्रत की पूजा विधि अत्यंत सरल है। इस व्रत की पूजा विधि निम्नलिखित है-

  • प्रदोष व्रत करने वाले मनुष्य को त्रयोदशी से एक दिन पहले ही मन वाणी और कर्म की शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करे और भगवान शिव का चिंतन करे।
  • इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को त्रयोदशी के पूरे दिन अन्न और जल ग्रहण नहीं करना चाहिए। संध्या को सूर्यास्त में जब तीन घड़ी का समय बचा हो तो स्नान कर के सफ़ेद वस्त्र धारण करे।
  • इसके बाद महेश्वर शिव का पूजन करने से पहले पूजन के स्थान को साफ-सुथरा कर के गंगाजल से पवित्र कर लेना चाहिए। गाय के गोबर से लीप कर मंडप का निर्माण करना चाहिए।
  • मंडप के ऊपर रंगीन चंदोवा लगाकर वंदनवार से सजाना चाहिए।
  • पाँच रंगों के मिश्रण से पद्म-पुष्प की आकृति बनाकर कुश का आसन बिछा दें।
  • व्रत करने वाले व्यक्ति तो पूर्व या उत्तर की दिशा की ओर मुख कर के बैठना चाहिए।
  • आसन पर विराजमान होने के बाद भगवान भोलेनाथ की स्थापितमूर्ति का मन में ध्यान करें।

ध्यान का स्वरूप

भगवान शिव-शंकर का ध्यान अत्यंत कल्याणकारी। कर्पूर की तरह श्वेत और करोड़ों चंद्रमाओं के समान कांतिमान भगवान शंकर त्रिनेत्रधारी हैं और उनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित हो रहा है।

वे जटाजूट धारी है जिंका वर्ण पिंगल है तथा नीलकंठ हैं। अनेक हारों से सुशोभित शिव वरदहस्त वाले, पर्शुधारी, नागों के कुंडल पहने हुए हैं। वे सदा व्याघ्र चरम धरण किए हुए और रत्नजटित सिंहासन पर विराजमान हैं। ऐसे शिवजी का मन में ध्यान करना चाहिए।

शिवजी का ऐसा ध्यान करने के पश्चात प्रदोष व्रत की पूजा विधि में आगे मानसिक संकल्प किया जाता है।

प्रदोष व्रत की पूजा का मानसिक संकल्प

प्रदोष व्रत में संकल्प करने से पूर्व अपने मन को एकाग्रचित्त कर लेना चाहिए। मन को सांसारिक विषयों से हटाते हुए हाथ जोड़कर मन में भगवान शिव का ध्यान करते हुए उनसे निवेदन करना चाहिए:

हे शंकर जी! आप मेरे सम्पूर्ण पापों के नाश के निमित्त प्रसन्न होइए। शोकसंतप्त, संसार के भय से भयभीत और अनेक प्रकार के रोगों से आक्रांत मुझ अनाथ की आप रक्षा कीजिये।

हे स्वामी! आप देवी पार्वती के सहित पधार कर मेरी पूजा ग्रहण कीजिये। ऐसा निवेदन करने के पश्चात ‘ॐ गौरी-सहित शिवायै नमः “ इस मंत्र से उनका आवाहन करना चाहिए। तत्पश्चात भगवान शिव को जल से स्नान कराना चाहिए।

स्नान के पश्चात भगवान शिव को श्रद्धा पूर्वक वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, द्रव्य, और आभूषण इत्यादि अर्पित करें। पुष्पों में भगवान शिव को बेल, मंदार, कमल, कनेर, और धतूरा जैसे पुष्प चढ़ाएँ। इसके पश्चात धूप-दीप देकर किसी ऋतुफल और गाय के दूध से बने खीर का नैवेद्य अर्पित करें। यह उपलब्ध ना हो तो कोई भी मीठा मिष्ठान्न भी अर्पित किया जा सकता है।

भगवान को सभी चीज़ें अर्पित करने के बाद ताम्बूल आदि चढ़ावें और उनकी आरती करें। आरती के बाद अंत में ‘ॐ मनः शिवाय’ इस मंत्र का एक हज़ार बार जप अवश्य करें। जप के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना उत्तम माना जाता है।

इस प्रकार से की गई पूजा के बाद ब्राह्मण को सात्विक भोजन कराकर यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर विदा करें। इससे प्रदोष व्रत की समाप्ती होती है।

इस प्रकार उपर्युक्त विधि से प्रदोष व्रत का पालन करना चाहिए। आइए अब प्रदोष व्रत के अवसर पर सुनी जाने वाली प्रदोष व्रत कथा को जान लेते हैं।

प्रदोष व्रत कथा

भगवान शिव-शंकर की प्रसन्नता हेतु किए जाने वाले प्रदोष व्रत की संक्षिप्त कथा ये हैं:

किसी ग्राम में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी हमेशा प्रदोष व्रत किया करती थी। उस ब्राह्मण को एक पुत्र था। एक दिन उनका पुत्र घर से गंगा-स्नान के लिए गया। रास्ते में उसे चोरों का गिरोह मिला।

चोरों ने लड़के से पूछा कि तेरे बाप का धन कहाँ रखा है? अगर नहीं बताओगे तो हम तुम्हें मार देंगे। लड़के ने उत्तर दिया-भाई हम तो बहुत गरीब हैं। मेरे पिता के पास धन कहाँ से आयेगा?

चोरों ने फिर लड़के से पूछा-यह तेरे कपड़े में क्या बंधा है?

लड़के ने चोरों को बताया कि इसमें रोटियाँ हैं जो चलते समय मेरी माता ने दी थीं। ऐसा सुनकर चोरों में से एक ने कहा कि यह सत्य कहता है। इसे छोड़ दिया जाए। वास्तव में यह लड़का बहुत गरीब मालूम होता है।

चोरों द्वारा मुक्त होकर वह लड़का एक नगर में पहुंचा। वहाँ उस नगर के सिपाही चोरों को ढूंढ रहे थे। सिपाहियों ने उस लड़के को देखकर सोचा कि यही चोर है।

सिपाही उस लड़के को चोर समझकर राजा के पास ले गए। राजा ने उस लड़के को बंदी बना कर कारावास में बंद कर दिया।

उधर उस लड़के की माता प्रदोष व्रत कर रही थीं। व्रत की समाप्ती के बाद उस रात में राजा को स्वप्न हुआ कि तुम इस लड़के को सबेरा होने से पहले ही छोड़ दो नहीं तो तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा।

सबेरा होते ही उस राजा ने लड़के को बुलाकर उससे सारी घटना सुनी। राजा ने उस ब्राह्मण लड़के के माता पिता को भी बुला लिया। राजा उन ब्राह्मण और उनकी पत्नी से बोला कि तुम लोगों को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।

तुम्हारा लड़का निर्दोष है। मैंने इसे चोर के भ्रम में पकड़ लिया था। अब इसकी सच्चाई से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें पाँच-पाँच ग्राम पुरस्कार स्वरूप देता हूँ। राजा ने ब्राह्मण कुमार को मुक्त कर दिया और वे प्रसन्नता पूर्वक रहने लगे। भगवान शंकर की कृपा से उस ब्राह्मण के घर सदा आनंद मंगल होने लगे।

इस प्रकार कोई भी मनुष्य जो इस प्रदोष व्रत को करता है उसके यहाँ नित्या ही आनंद-मंगल होता है।

प्रदोष व्रत कब से शुरू करें 2022

प्रदोष व्रत आप किसी भी त्रयोदशी तिथि से शुरू कर सकते हैं। 2022 की पौष, शुक्ल त्रयोदशी, शनि प्रदोष व्रत शनिवार, 15 जनवरी 2022 को सम्पन्न हुआ था। तिथि 14 जनवरी रात 10:19 बजे – 16 जनवरी दोपहर 12:57 बजे तक मान्य थी। आप इसके पश्चात किसी भी त्रयोदशी के दिन यह व्रत कर सकते हैं।

प्रदोष व्रत में क्या-क्या खाना चाहिए?

प्रदोष व्रत में क्या-क्या खाना चाहिए यह व्रत करने वालों के लिए दुविधा बनी रहती है। आइए आपको बतलाते हैं कि इस व्रत में खाने पीने के क्या नियम हैं।

प्रदोष व्रत करने वाले को दिन भर भोजन नहीं करना चाहिए। संध्या में पूजन के बाद भोजन किया जाता है। नियम के अनुसार प्रदोष का व्रत निर्जला व्रत माना जाता है। यानि इस दिन कुछ भी खाया-पिया नहीं जाता। केवल भोजन ही नहीं बल्कि मन में आने वाले बुरे विचारों और सभी प्रकार की इच्छाओं का भी त्याग कर दिया जाता है।

प्रदोष व्रत में दिन भर व्रत करने के पश्चात भगवान शिव का संध्याकाल में पूजन करें। प्रदोष काल में शिव के पूजन के बाद शुद्ध-सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है।

प्रदोष व्रत 2022 का कलेंडर

वर्ष 2022 में नीचे दिये गए प्रदोष व्रत पड़ेंगे। आइए जानते हैं कि 2022 में प्रदोष व्रत कब-कब है?

2022 प्रदोष व्रत तिथि-

जनवरी 2022

पौष, शुक्ल त्रयोदशी, शनि प्रदोष व्रत                                                                                                      शनिवार, 15 जनवरी 2022                                                                                                                14 जनवरी रात 10:19 बजे – 16 जनवरी दोपहर 12:57 बजे

माघ, कृष्ण त्रयोदशी, रवि प्रदोष व्रत                                                                                                      रविवार, 30 जनवरी 2022                                                                                                                       29 जनवरी रात 08:37 बजे – 30 जनवरी शाम 05:29 बजे

फरवरी 2022                                                                                                                                        माघ, शुक्ल त्रयोदशी, सोम प्रदोष व्रत                                                                                                   सोमवार, 14 फरवरी 2022                                                                                                                       13 फरवरी शाम 06:42 बजे – 14 फरवरी रात 08:28 बजे

फाल्गुन, कृष्ण त्रयोदशी, सोम प्रदोष व्रत                                                                                                सोमवार, 28 फरवरी 2022                                                                                                                      28 फरवरी सुबह 05:43 बजे – 01 मार्च सुबह 03:16 बजे

मार्च 2022

फाल्गुन, शुक्ल त्रयोदशी, भौम प्रदोष व्रत                                                                                              मंगलवार, 15 मार्च 2022                                                                                                                             15 मार्च दोपहर 01:12 बजे – 16 मार्च दोपहर 01:40 बजे

चैत्र, कृष्ण त्रयोदशी, भौम प्रदोष व्रत                                                                                                    मंगलवार, 29 मार्च 2022                                                                                                                             29 मार्च दोपहर 02:38 बजे – 30 मार्च दोपहर 01:19 बजे

अप्रैल 2022

चैत्र, शुक्ल त्रयोदशी, गुरु प्रदोष व्रत                                                                                                       गुरुवार, 14 अप्रैल 2022                                                                                                                            14 अप्रैल सुबह 04:50 बजे – 15 अप्रैल सुबह 03:56 बजे

वैशाख, कृष्ण त्रयोदशी, गुरु प्रदोष व्रत                                                                                                    गुरुवार, 28 अप्रैल 2022                                                                                                                            28 अप्रैल दोपहर 12:24 बजे – 29 अप्रैल दोपहर 12:27 बजे

मई 2022

वैशाख, शुक्ल त्रयोदशी, शुक्र प्रदोष व्रत                                                                                                शुक्रवार, 13 मई 2022                                                                                                                            13 मई को शाम 05:27 बजे – 14 मई को दोपहर 03:23 बजे

ज्येष्ठ, कृष्ण त्रयोदशी, शुक्र प्रदोष व्रत                                                                                                   शुक्रवार, 27 मई 2022                                                                                                                              27 मई सुबह 11:48 बजे – 28 मई दोपहर 01:10 बजे

जून 2022

ज्येष्ठ, शुक्ल त्रयोदशी, रवि प्रदोष व्रत                                                                                                    रविवार, 12 जून 2022                                                                                                                               12 जून सुबह 03:24 बजे – 13 जून दोपहर 12:27 बजे

आषाढ़, कृष्ण त्रयोदशी, रवि प्रदोष व्रत                                                                                                   रविवार, 26 जून 2022                                                                                                                             26 जून सुबह 01:10 बजे – 27 जून सुबह 03:26 बजे

जुलाई 2022

आषाढ़, कृष्ण त्रयोदशी, सोम प्रदोष व्रत                                                                                                 सोमवार, 11 जुलाई 2022                                                                                                                         11 जुलाई सुबह 11:14 बजे – 12 जुलाई सुबह 07:46 बजे

श्रवण, कृष्ण त्रयोदशी, सोम प्रदोष व्रत                                                                                                   सोमवार, 25 जुलाई 2022                                                                                                                          25 जुलाई शाम 04:16 बजे – 26 जुलाई शाम 06:47 बजे

अगस्त 2022

श्रवण, शुक्ल त्रयोदशी, भौम प्रदोष व्रत                                                                                                   मंगलवार, 09 अगस्त 2022                                                                                                                       09 अगस्त शाम 05:46 बजे – 10 अगस्त दोपहर 02:16 बजे

भाद्रपद, कृष्ण त्रयोदशी, बुद्ध प्रदोष व्रत                                                                                                             बुधवार, 24 अगस्त 2022                                                                                                                          24 अगस्त सुबह 08:31 बजे – 25 अगस्त सुबह 10:38 बजे

सितंबर 2022

भाद्रपद, शुक्ल त्रयोदशी, गुरु प्रदोष व्रत                                                                                                   गुरुवार, 08 सितंबर 2022                                                                                                                           08 सितंबर को दोपहर 12:05 बजे – 08 सितंबर को रात 09:03 बजे

अश्विना, कृष्ण त्रयोदशी, शुक्र प्रदोष व्रत                                                                                                  शुक्रवार, 23 सितंबर 2022                                                                                                                              23 सितंबर सुबह 01:18 बजे – 24 सितंबर सुबह 02:31 बजे

अक्टूबर 2022

अश्विना, शुक्ल त्रयोदशी, शुक्र प्रदोष व्रत                                                                                                  शुक्रवार, 07 अक्टूबर 2022                                                                                                                          07 अक्टूबर सुबह 07:27 बजे – 08 अक्टूबर सुबह 05:25 बजे

कार्तिक, कृष्ण त्रयोदशी, शनि प्रदोष व्रत                                                                                                  शनिवार, 22 अक्टूबर 2022                                                                                                                           22 अक्टूबर को शाम 06:03 बजे – 23 अक्टूबर को शाम 06:03 बजे

नवंबर 2022

कार्तिक, शुक्ल त्रयोदशी, शनि प्रदोष व्रत                                                                                                     शनिवार, 05 नवंबर 2022                                                                                                                            05 नवंबर शाम 05:07 बजे – 06 नवंबर शाम 04:29 बजे

मार्गशीर्ष, कृष्ण त्रयोदशी, सोम प्रदोष व्रत                                                                                               सोमवार, 21 नवंबर 2022                                                                                                                           21 नवंबर सुबह 10:07 बजे – 22 नवंबर सुबह 08:49 बजे

दिसंबर 2022

मार्गशीर्ष, शुक्ल त्रयोदशी, सोम प्रदोष व्रत                                                                                                सोमवार, 05 दिसंबर 2022                                                                                                                    05 दिसंबर सुबह 05:77 बजे – 06 दिसंबर सुबह 06:47 बजे

पौष, कृष्ण त्रयोदशी, बुद्ध प्रदोष व्रत                                                                                                               बुधवार, 21 दिसंबर 2022                                                                                                                               21 दिसंबर सुबह 00:45 बजे – 22 दिसंबर रात 10:16 बजे

प्रदोष व्रत के लाभ

पुराणों के अनुसार प्रदोष व्रत करने से सम्पूर्ण पापों का नाश हो जाता है। यदि किसी ने सैकड़ों ब्रह्महत्या भी की हो तो उसका पाप भी खत्म हो जाता है। प्रदोश व्रत करने से भगवान शिव शीघ्र ही प्रसन्न हो कर व्रत करने वाले का कल्याण करते हैं।

प्रदोष व्रत के लाभ ये हैं-

  1. सम्पूर्ण पापों का नाश हो जाता है
  2. दरिद्रता दूर हो जाती है
  3. ब्रह्महत्या का पाप भी नष्ट हो जाता है।
  4. सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं
  5. सुख, धन-दौलत और संतान की प्राप्ति भी प्रदोष व्रत करने से होती है
  6. प्रदोष व्रत से विद्यार्थियों को विद्या और विधवाओं को धर्म की प्राप्ति का लाभ मिलता है
  7. प्रदोष व्रत मनुष्य के सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला है

प्रदोष व्रत के लाभ और फल की महिमा तो सर्वथा वर्णन से परे है। किन्तु आम जनमानस की रुचि और देवाधिदेव महादेव की कृपा से अपने जीवन में कल्याण के लिए प्रदोष व्रत के कुछ लाभ ऊपर गिनाए गए हैं। प्रदोष व्रत ना सिर्फ पृथ्वी लोक में बल्कि मृत्यु के बाद अन्य लोकों में भी सुख-शांति प्रदान करता है।

प्रदोष व्रत के नियम

भगवान शंकर की प्रसन्नता हेतु किया जाने वाला प्रदोष व्रत 11 त्रयोदशी या पूरे वर्ष की 26 त्रयोदशी तक करने के बाद ही उद्यापन करें।

प्रदोष व्रत को करने से पहले इस व्रत के नियम भी अच्छे से समझ लेने चाहिए।

  • प्रदोष व्रत माह में पड़ने वाले शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों की त्रयोदशी के दिन किया जाता है
  • व्यक्ति को त्रयोदशी के पूरे दिन अन्न और जल ग्रहण नहीं करना चाहिए। साँयकाल में पूजन के बाद सात्विक भोजन का विधान है।
  • एक बार व्रत धारण करने के पश्चात पूरे ग्यारह या 26 त्रयोदशियों तक लगातार इस प्रदोष व्रत का पालन करना चाहिए।
  • प्रदोष व्रत में दिन भर भोजन नहीं करें और शाम के समय जब सूर्यास्त में तीन घड़ी का समय बचा हो तब स्नान इत्यादि कर के सफ़ेद वस्त्रों को धारण कर के शिव जी का पूजन करना चाहिए।
  • प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठ कर ही सम्पन्न करनी चाहिए।
  • व्रती को सत्य भाषण करना चाहिए और पृथ्वी पर शयन करना चाहिए।
  • इस व्रत को करने वाले मनुष्य को अपने मन में बुरे विचार और सांसारिक मोह-माया को नहीं आने देना चाहिए। इस व्रत के बाकी के नियम ऊपर प्रदोष व्रत की पूजा विधि में दिये गए हैं।  

प्रदोष व्रत का उद्यापन कब करना चाहिए?

प्रदोष व्रत का उद्यापन करने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि आपने 11 या 26 त्रयोदशियों तक लगातार व्रत -उपवास किया हो। ग्यारह अथवा छब्बीस त्रयोदशीयों तक व्रत रखने के पश्चात ही प्रदोष व्रत का उद्यापन किया जाता है।

प्रदोष व्रत का उद्यापन हमेशा त्रयोदशी तिथि के दिन ही करने का नियम है।

प्रदोष व्रत उद्यापन विधि:

  • त्रयोदशी के दिन उद्यापन करने से एक दिन पहले यानि द्वादशी के दिन अपने घर में भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए।
  • प्रदोष व्रत के उद्यापन से ठीक एक दिन पहले घर अथवा किसी मंदिर में सत्संग-भजन कीर्तन से भगवान शंकर की स्तुति करनी चाहिए और रात भर जागरण करना चाहिए।
  • उद्यापन करने वाले दिन सुबह स्नान आदि क्रियाओं से निवृत्त होकर रंगीन वस्त्रों से मंडप बनाकर उसे सजना चाहिए।
  • बने हुए मंडप में शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर के शास्त्र विधिवत पुजा करनी चाहिए।
  • प्रदोष व्रत के उद्यापन में हवन करना भी आवश्यक माना जाता है। इसके लिए भगवान शंकर और माता पार्वती के निमित्त गाय के दूध से बने हुए खीर से अग्नि में हवन करना चाहिए।
  • हवन करते हुए ॐ उमासहित-शिवाय नमः: मंत्र का जाप कर के 108 बार आहुती दें।
  • प्रदोष व्रत के उद्यापन हेतु हवन पूर्ण होने पर ब्राह्मण को यथाशक्ति दान दें। उन्हे भोजन भी कराने का प्रबंध करें। इसके बाद “व्रत पूर्ण हो” ऐसा ब्राह्मणों द्वारा कहलवाना चाहिए।
  • इसके बाद भगवान शंकर का स्मरण करते हुए सभी को प्रसाद दें और स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें।

प्रदोष व्रत के इस उद्यापन विधि को करने से यह व्रत पूर्ण माना जाता है और व्रती पुत्र-पौत्रादी से युक्त होकर आरोग्य लाभ करता है। स्कन्द पुराण के अनुसार ऐसा व्यक्ति अपने सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर शिव कृपा प्राप्त करता है।

प्रदोष व्रत की आरती

प्रदोष व्रत की शाम में भगवान शिव की आरती करने के लिए इस आरती का प्रयोग करना चाहिए:

जै शिव ओंकारा ॐ हरशिव ओंकारा।                                                                                                      ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा ।। जय0 ।।

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।                                                                                                          हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे ।। जय0 ।।

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।                                                                                                   त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहें।। जय0 ।।

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।                                                                                                      चन्दन मृगमद सोहे भाले शशि धारी ।। जय0 ।।

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।                                                                                                                सनकादिक प्रभुतादिक भूतादिक संगे ।। जय0 ।।

कर मध्य कमंडल चक्र त्रिशूल धर्ता।                                                                                              जगकरता जगभरता जगसंहार करता ।। जय0 ।।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।                                                                                                      प्राणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका। जय0 ।।

त्रिगुण स्वामी की आरती जो कोई नर गावै।                                                                                                क़हत शिवानंद स्वामी सुख संपत्ति पावै।। जय0 ।।

इस प्रदोष आरती को घर के सभी सदस्यों के साथ मिलकर करना चाहिए।

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