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ध्यान के चमत्कारिक अनुभव

ध्यान के चमत्कारिक अनुभव

ध्यान के चमत्कारिक अनुभव – मनुष्य की एकाग्रता एवं मानव मस्तिष्क की असीमित क्षमता है जो अनवरत एवं कठिन अभ्यास का प्रतिरूपण है | ‘ध्यान’ अर्थात ‘योग’ का आठवां भाग जो मानव जीवन में अति महत्वपूर्ण है। योग साधना के अनुसार, ‘’ध्यान को साधने से मनुष्य स्वतः ही “सधने” लगते है” परन्तु योग के अन्य भागों पर ये लागू नहीं होता। “ध्यान” इस लोक और परलोक के मध्य का पथ है। ध्यान अर्थात जागरूकता, जिसका अर्थ है जहाँ भी हमारा चित्त लग जाता है वहीँ वृत्ति के एक तार का चलना ही “ध्यान” है।

हिंदी भाषा में ध्यान को “बोध” भी कहते है तथा अन्य देशों में ध्यान को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जैसे की – जापान में ध्यान को “झेन” तथा चाइना में ध्यान को “च्यान” कह कर सम्बोधित करते है। ध्यान के और भी कई अर्थ है जैसे की – होश, अवेयरनेस, दृष्टा भाव तथा साक्षी भाव। आज हम आपको ध्यान से जुड़ें कई तथ्यों को बतलायेंगे, जैसे की – ध्यान के चमत्कारिक अनुभव, ध्यान के अनुभव, ध्यान के प्रारंभिक अनुभव, ध्यान में आध्यात्मिक अनुभव, इत्यादि। तो, आइये शुरू करते है |


ध्यान के चमत्कारिक अनुभव


ध्यान का अनुभव अतुल्य, अद्वितीय तथा चमत्कारिक है। मनुष्य का मन यदि किसी भी कार्य में ना लगे तथा उसका साथ देना बंद कर दे, यहाँ तक की मन के मर जाने की स्थिति आ जाए तो वह मनुष्य स्वयं को बचाने का हर तरीके से पूरा प्रयास करता है। मनुष्य का मन तथा बुद्धि जब अपने विचारों को उस मनुष्य के साथ साझा करना बंद कर दे तब मनुष्य का मस्तिष्क विचारों के एक समूह को प्रस्तुत कर देता है परन्तु, जो मनुष्य अपने दिनचर्या में ध्यान को सम्मिलित करते है तथा बहुत ही ईमानदारी के साथ ध्यान लगाते है उन लोगों का मस्तिष्क कभी भी किसी के भी बहकावे में नहीं आता तथा हर तरीके असम्यक वृति और इच्छा से दूर रहता है और जिनका भी मन-मष्तिस्क किसी के भी बहकावे में आ जाए वो ध्यानी अथवा साधक नहीं होते।


ध्यान के अनुभव


इस दुनिया में जितने भी साधक है, सभी को अलग-अलग तरह से ध्यान का अनुभव प्राप्त हुआ परन्तु एक निश्चित सीमा तक पहुंचते ही ध्यान को लेकर प्रत्येक के अनुभव में लगभग समानता आ गई। बहुत सारे लोगों का यह मानना है कि ध्यान के अनुभव के लिए बहुत ही लम्बे समय की आवश्यकता पड़ती है पर ऐसी कोई भी बात नहीं है यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है जो “साधक” है। ध्यान का अनुभव कोई इंसान 2 से 3 महीने में भी कर सकता पर इसके लिए चाहिए सच्ची लगन और निष्ठा। यदि सही रूप से ध्यान किया जाए तो बहुत कम समय के अंदर ही मनुष्य को ध्यान के सही परिणाम दिख सकता है।


ध्यान के प्रारंभिक अनुभव


प्रारम्भ में प्रत्येक व्यक्ति, जो ध्यान लगाते है उन्हें कुछ एक जैसे अनुभव तथा कुछ-कुछ अलग प्रकार के अनुभव मिलते है। सबसे पहले तो साधक को अपने भौहों के मध्य जहाँ आज्ञा चक्र स्थित है वहाँ अन्धकार दिखलाई पड़ता है। उस अन्धकार में कहीं नीला तो कहीं पिले रंग का आभास होता है। माना जाता है की उस अन्धकार में दिखने वाले रंग सम्पूर्ण जगत का परावर्तन हो सकता है या फिर हमारे ही शरीर में स्थित ऊर्जा का रूप भी हो सकता है। उन रंगीन गोलों के अंदर और भी गोले चलते रहते है जो कुछ क्षण के बाद ही अदृश्य हो जाते है और उसके स्थान पर उससे भी बड़ा गोला दिखाई पड़ने लगता है और यही क्रम चलता रहता है।


ध्यान का अनुभव लेने वाले कुछ ‘ध्यानियों ’ का मानना है कि नीला रंग आज्ञा चक्र तथा जीवात्मा का प्रतीक है। ध्यान में हमे जीवात्मा के रूप में नीला रंग दिखलाई पड़ता है और पीला रंग जीवात्मा के प्रकाश का प्रतीक है। इन रंगीन गोलों का दिखना – साधक के आज्ञा चक्र की जागृति के तरफ इशारा करता है।


ध्यान केंद्रित कैसे करे


भगवान शिव ने माता पार्वती को ध्यान के कुल 112 प्रकार बतलायें थे जो की “भैरव तंत्र” में उल्लेखिते है। हिन्दू धर्म में “ध्यान” के हजारों तरीके बताये गए है पर यदि आप ध्यान केंद्रित करना चाहते है तो, यहाँ हम आपको ध्यान केंद्रित करने के कुछ तरीकों से अवगत करवा रहें है, आइये इन तरीकों को एक-एक कर के समझते है :-


प्रथम चरण :

ओशो के अनुसार ध्यान प्रक्रिया शुरू करने से पहले प्रत्येक व्यक्ति को रेचन हो जाना जो की अति आवश्यक है अर्थात अपनी चेतना पर लगी हुई धूल की सफाई करना इसलिए यदि आप चाहे तो पहले भस्त्रिका और कपालभाति प्राणायाम कर सकते है या फिर आप अन्य कोई भी प्राणायाम कर सकते है।


द्वितीय चरण :

प्रारम्भ में आप अपने शरीर के प्रत्येक हलचल पर अच्छे से ध्यान दें और उनका सही रूप से निरिक्षण भी करें साथ ही साथ बाहर की ध्वनि भी सुनें। आपके आस-पास जो कुछ भी घटित हो रहा उसे अपना मन स्थिर करते हुए गौर से सुनें।


तृतीय चरण :

धीरे-धीरे अपने मन को अपने अंदर की और केंद्रित करें। आप अपने विचार और भावों पर शान्ति से गौर करें। आपके चुपचाप गौर करने से ही आपका चित्त शांति से स्थिर होने लगेगा। अपने अंदर से मौन होना ध्यान के लिए अति आवश्यक है।


चतुर्थ चरण :

अब आपकी स्थिति सिर्फ देखने और महसूस करने की है। धीरे-धीरे आपका देखना और सुनना और भी गहराई तक आपको लेकर जाएगा और उसके साथ ही आप ध्यान की तरफ आगे बढ़ेंगे और उसे केंद्रित करने में सक्षम होते जाएंगे।


ध्यान में आध्यात्मिक अनुभव


ध्यान करने से साधक को कई प्रकार के आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होते है, जो इस प्रकार है :

अपने आत्म संकेत की अनुभूति होना।

सही रूप से प्रकृति की समझ आना।

साधक प्रकृति के साथ समरसता महसूस करने लगता है।

कुण्डलिनी शक्ति का जागृत होना।

दिव्य दर्शन का बोध होना।

साधक को अपने गुण दोष साफ़ नजर आते है।

तीसरे आँख के खुलने का अनुभव होना।


ध्यान में चमत्कारिक अनुभव


ध्यान करने से साधक को कई प्रकार के चमत्कारिक अनुभव प्राप्त होते है, जो इस प्रकार है

एक से अधिक शरीर के होने का अनुभव होना।

दिव्य ज्योति का दिखलाई पड़ना।

साधक को अपने प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अपने अंतरात्मा से प्राप्त हो जाती है।

आत्मबोध का अनुभव होना।

साधक को पवित्रता या शुद्धता का अनुभव होने लगता है।

किसी के भी मन की बात आसानी से जान लेना।

ईश्वर के रूप का दर्शन होने का अनुभव।

शक्तिपात का अनुभव।

“मूल बाँध” और “अश्वनी मुद्रा” का अनुभव।

इष्ट देव और गुरु की कृपा प्राप्ति का अनुभव।


ध्यान में क्या -क्या अनुभव होते है ?


ध्यान करने से आध्यात्मिक तथा चमत्कारिक अनुभव के आलावा और भी बहुत सारे अनुभव प्राप्त होते है जो इस प्रकार है :-

शरीर के हल्केपन का अनुभव होना।

बिना स्पर्श के ही वस्तुवों का उनके जगह से खिसक जाना।

किसी रोगी को छूने मात्र से ही उसका स्वस्थ हो जाना।

अंगों के फड़कना का अनुभव होना।

इष्ट देव-देवी और गुरु का साधक के शरीर में प्रवेश करना।


ध्यान में प्रकाश क्यों दिखता है ?


कोई भी मनुष्य अथवा साधक जब ध्यान करता है तो उसे कुछ विशेष प्रकार के रंगों का प्रकाश दिखलाई पड़ता है। प्रकाश का दिखना एक अलौकिक और दैविक अनुभूति है। इस प्रकाश को देखने वाला साधक भी इसे देख अचंभित हो जाता है। बहुत सारे साधकों के अनुभवों से यह पता चला है कि साधक को ध्यान करने के दौरान कई तरह के रंगों की रौशनी दिखलाई पड़ते है। किसी साधक को मस्तक के मध्य में अर्थात आज्ञाचक्र के स्थान पर ये रौशनी दिखलाई पड़ते है। साधक को आँखे बंद होने पर भी “दिव्य प्रकाश” की अनुभूति होती है। साधक को नीला, पीला, सफ़ेद, लाल, हरा तथा धुवें जैसे रंगों के प्रकाश दिखलाई पड़ते है। कभी-कभी साधक को इन सारे रंगों का मिश्रण देखता है। प्रत्येक साधक को अलग-अलग अनुभव प्राप्त होता है।
किसी-किसी साधक को अपने ‘मानसिक क्षितिज’ में सूर्य, चंद्र तथा समस्त तारामंडलों का दर्शन होता है। ध्यान के दौरान दिखने वाले इस रहस्य्मयी और अलौकिक प्रकाश को “तन्मांत्रिक प्रकाश” कहते हैं। साधक को अलग-अलग रंगों की रौशनी दिखलाई पड़ते है और ये रौशनी पांच तत्व “पृथ्वी”, “जल”, “अग्नि”, “वायु” तथा “आकाश” से संबंधित हैं। अधिकतर साधक को सफ़ेद तथा पिले रंग की रौशनी दिखलाई पड़ती है। यदि किसी को इस तरह के रौशनी के दर्शन हो रहे तो यही समझ लेना चाहिए की आपके लिए ‘साधना का मार्ग’ खुल चूका है और उस ‘आपको’ को उस दिशा में अवश्य कदम बढ़ाना चाहिए। लगातार ध्यान करते रहने से कुछ ही महीनों के अंतराल पर प्रकाश का दायरा भी बड़ा हो जाता है। ध्यान के दौरान सफ़ेद प्रकाश अचानक से सूरज के जैसे चमकदार होता दिखलाई पड़ेगा। परन्तु, यह दिव्य प्रकाश स्थिर नहीं होगी अचानक ही अदृश्य भी हो जायेगी। इन प्रकाश के रंगों के दर्शन के बाद मन प्रसन्नता से भर उठेगा और इन्हें दुबारा देखने की इच्छा भी जागेगी। किसी भी साधक के लिए इस तरह से दिव्य प्रकाश के दर्शन होना बहुत ही दिव्य अनुभव होता है।

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