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दुःख है |

भगवान बुद्ध की सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिक्षा चार आर्य सत्य है | इन्हे केवल सत्य नहीं बल्कि आर्य सत्य कहा जाता है | इन्हे दो महत्वपूर्ण कारणों से आर्य सत्य कहा जाता है | प्रथम अर्थ में है की इन सत्य को केवल आर्य लोग ही समझ सकते है न की साधारण लोग | द्वितीय अर्थ है की ये सत्य श्रेष्ठ एवं शाश्वत है | लोकप्रिय रूप में इन्हे ‘ चत्वारि-आर्यसत्य ‘ के नाम से जाना जाता है | प्रथम आर्यसत्य शेष आर्यसत्यों के लिए आधार का कार्य करते है |

प्रथम आर्यसत्य की मान्यता है कि ” इदम दु:खम अर्थात दुःख है | ” प्रथम आर्य सत्य की स्वीकार्यता ही आध्यात्मिक पथ का मार्ग प्रशस्त करती है | यदि आपको इसका ज्ञान नहीं है कि जो दृश्य अथवा अदृश्य है वही प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दु:ख का कारण है तब तक आप दुखों का अंत नहीं कर सकते | सिद्धार्थ गौतम एक राजा के पुत्र थे | उनकी परवरिश इस प्रकार से की गई थी कि सारी सुख-सुविधाएं और विलासिता के साधनों को उनके चारों तरफ केंद्रित किया गया था | उनके पिता ,जो एक राजा थे , उन्होंने एक नई नगरी बसाई थी जिसमें की सभी वृद्ध, बीमार और भौतिक रूप से अपंग लोग रह सके | ऐसा इसलिए किया गया था ताकि सिद्धार्थ गौतम दु:ख के किसी भी प्रतीक चिन्हों को नहीं देख सके | यद्यपि नियति कुछ और ही थी | एक दिन सिद्धार्थ गौतम को मौका मिल ही गया कि वह नगर के बाह्य क्षेत्र का भ्रमण कर सके | तब उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति, एक बीमार व्यक्ति और एक मृत व्यक्ति को देखा | यह दु:ख और पीड़ा ही थी जिसने सिद्धार्थ गौतम को जीवन के परम सत्य को जानने के लिए अध्यात्मिक पथ पर अग्रसर किया |

संसार में दुःख या पीड़ा है | जीवन दु:ख है | वृद्धावस्था दु:ख है | बीमारी दु:ख है | भौतिक और मानसिक पीड़ा भी दु:ख है | असफलता दु:ख है | अपने प्रियजनों से बिछड़ जाना दु:ख है | अप्रिय लोगों से मिलन भी दु:ख है | इच्छाओं की पूर्ति ना हो पाना दु:ख है | यह सारे दु:ख किसी एक जन्म तक ही सीमित नहीं है | प्रत्येक जीवन में जन्म से मृत्यु तक हर एक इंसान को इन सभी दु:खों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भोगना पड़ता है | यद्यपि अधिकांश मनुष्य ऐसा नहीं समझ पाते क्योंकि वे माया ( या मार् ) के भ्रम में रहते है | कुछ विरले ही मनुष्य हैं जो सम्यक ज्ञान और साक्षी भाव के अनवरत प्रयास से दु:ख के इस सत्य को अनुभव कर पाते हैं | सामान्य मनुष्य की धारणा है कि तात्कालिक सुख ही सत्य है | वे लोग यह भी मानते हैं कि यह अस्थायी सुख जैसे शाश्वत आनंद हो | यद्यपि यह अस्थायी और क्षणभंगुर प्रकृति का है | इस संसार में अज्ञानता के कारण मानव जीवन के इस सत्य को स्थायी मान बैठा है | अस्थायी और क्षणभंगुर प्रकृति होने के कारण अल्पकाल में ही यह सुख समाप्त खत्म हो जाते हैं | जब यह समाप्त या खत्म होते हैं तो हमारे जीवन में असीम पीड़ा और दु:ख दे जाते हैं |

युवा अवस्था है लेकिन जब इसका क्षय होता है तो वृद्धावस्था का दु:ख लाता है | धन है लेकिन जब यह नष्ट या क्षय होता है तो दु:ख और पीड़ा देता है | हमारे माता -पिता हमारे साथ हैं लेकिन जब उनकी मृत्यु होती है तो हमें असीम पीड़ा और दुख होता है | पति और पत्नी का एक साथ होना जीवन के सबसे सुंदर क्षणों में से एक है लेकिन जब पति अथवा पत्नी में से कोई जीवन की यात्रा में बिछुड़ जाता है तो यह हमें अकेला और निःसहाय छोड़ देता है | हमारे बच्चे हमारे जीवन में महान सुख और खुशी के पल लेकर आते हैं | लेकिन जब हम उन्हें खो देते हैं तो यह हमारे जीवन की एक अप्रत्याशित दुर्घटना हो जाती है | जब हम अपने जीवन में अनवरत असफलता को प्राप्त करते हैं तो हमें दु:ख होता है | हमारा मन कुछ चीजों को निश्चित तरीके से प्राप्त करना चाहता है | यद्यपि बाह्य परिस्थितियां हमारे हाथ में नहीं होती और न ही उपलब्धि ही | जब हम इन इच्छाओं को अथवा इक्षित वस्तुओं को प्राप्त नहीं कर पाते तो यह हमें दुख और पीड़ा देते हैं | किसी से बहुत प्रगाढ़ मित्रता हो सकती हैं लेकिन जब परिस्थितियां उन्हें तोड़ देती है तो हम अपने आप को अकेला और अवसाद ग्रस्त पाते हैं | भौतिक शरीर और सुंदरता का आकर्षण खुशी लाता है लेकिन क्षणभंगुर प्रकृति के कारण अल्पकाल में इसका भी क्षय होता है जो अवसाद एवं पीड़ा लाता है|

सत्य की स्वीकार्यता ही वास्तविक जीवन जीने की कला है | अज्ञानता और भ्रम के कारण हम इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पाते | मानव इन सभी सुख के आकर्षण को प्राप्त कर लेना चाहता है जैसे वह अपनी मुट्ठी में बालू को पकड़ जोर से दबाता है | हालांकि जो मनुष्य जितना ही जोर से उसे दबाता है या पकड़ने की कोशिश करता है उतनी ही तेजी से तो उन्हें खो देता है जैसे बालू हमारे मुट्ठी से निकल जाती है | जब हम अपने आपको परिस्थितियों पर नियंत्रण करने में असमर्थ पाते हैं तब हम दुख और पीड़ा के सागर में डूब जाते हैं | जब कोई मनुष्य सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता या परिस्थितियों को संभाल नहीं पाता तब वह इस ‘मूल्यवान जीवन’ से भी विरक्ति करने लगता है | कभी-कभी तो मनुष्य वर्षों-वर्षों तक दिन-रात इस दु:ख और पीड़ा को भोगता रहता है |

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