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दुःख का अंत

सभी आध्यात्मिक प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि इस जीवन में दुःख का अंत संभव है या नहीं। आत्मज्ञान के बाद भगवान बुद्ध ने परम सत्य का अनुभव किया कि दुःख का अंत संभव है। वह कहते है- “मैं दुख, उसकी उत्पत्ति, समाप्ति और दुःख समाप्ति का मार्ग सिखाता हूं। यही सब मैं सिखाता हूं। ” तीसरा आर्य सत्य स्पष्ट रूप से बताता है कि दुःख का निवारण है। यह लोकप्रिय रूप से “निरोध” के रूप में जाना जाता है जिसका अर्थ है पीड़ा को समाप्त करना ।

दु:ख कारण को समाप्त करके दु:ख का अंत किया जा सकता है। जैसा कि हम जानते हैं कि यह कारण और प्रभाव के वैज्ञानिक प्रमेय पर आधारित है। दु:ख ही प्रभाव है जबकि इच्छा और अज्ञान ही दु:ख का अंतिम कारण है। जब हम कारण को दूर करते हैं, तो हम दु:ख को समाप्त कर देते हैं। इच्छा और अज्ञान दोनों अंतर-संबंधित हैं। अधिकांश मानवता इस घातक संयोजन से जन्म के बाद जन्म लेने के लिए पीड़ित हैं। मानव के पास जब तक ‘सम्यक ज्ञान’ नहीं है, तबतक वह अज्ञानता का अवगुण धारण किये हुए है । जीवन की अंतहीन इच्छाओं को चलाने के लिए अज्ञानता का सहारा लिया जाता है। मारा (माया) का भ्रम जीवन के अंतिम सत्य के बारे में हमें अनभिज्ञ बनाये रखता है।

यहाँ बहुत ही बड़ा प्रश्न उठता है, अगर कोई इच्छा ही नहीं है तो जीवन कैसे जीया जा सकता है। यहां सम्यक ज्ञान जीवन जीने की वास्तविक कला का मार्ग प्रशस्त करता है। तृष्णा का अर्थ है कि व्यक्ति जीवन में सुख और संतुष्टि पाने के लिए भौतिक वस्तुओं, शक्ति, प्रसिद्धि आदि के संदर्भ में कुछ हासिल करना चाहता है। तृष्णा का अर्थ यह भी है कि व्यक्ति वर्तमान स्थितियों से संतुष्ट नहीं है और उसमें बदलाव चाहता है। धन, समृद्धि, सुंदर महिलाएं, प्रसिद्धि, शक्ति, लोकप्रियता, कामुक सुखों के लिए वस्तुएं, बड़े घर, लक्जरी वाहन – सूचियां अंतहीन हैं। इच्छाएं अकेले नहीं आती हैं, यह गंभीर रूप से आसक्तियों से जुड़ी होती हैं। सही ज्ञान आपको इच्छाओं से नहीं रोकता है, बल्कि अनित्य के साथ लगाव की अनदेखी करता है। अगर एक बार यहां जन्म हो जाता है, तो किसी को भी जीवित रहने के लिए काम करना पड़ता है और कर्तव्य निभाना पड़ता है। कोई भी आपको इच्छाओं की तलाश करने से नहीं रोक रहा है। लेकिन अंतिम सत्य यह है कि ये सभी चीजें प्रकृति में अनित्य हैं। जब वे क्षय हो जाते हैं या समाप्त हो जाते हैं-तब आप अज्ञानता के कारण खुद को लगभग विखंडित एवं असफल महसूस करते हैं।

यदि कोई वास्तव में दु:ख की पीड़ा को समाप्त करना चाहता है, तो उसे इच्छा के साथ की आसक्ति से मुक्त होना होगा। किसी की तृष्णा समाप्त होने पर दु:ख भी दूर हो जाता है। व्यक्ति को अपना कर्तव्य निभाना होगा | इच्छा , मनुष्य के जीवन गुणवत्ता के उत्थान के लिए होनी चाहिए | यहां तक कि भगवान बुद्ध ने जीवन के दु:खों को समाप्त करने की इच्छा की और इसलिए उन्होंने इस जीवन में निर्वाण (निब्बाण ) प्राप्त किया। आप सभी इच्छाओं को प्राप्त करने के बाद भी पूर्णतः संतुष्ट नहीं हो सकते । संतुष्टि और सुख बाहर से नहीं आते हैं। जीवन के अनमोल क्षणों को आँख बंद करके व्यर्थ न करें। ऐसा कर जीवन के अंत में आप कुछ भी हासिल नहीं कर पायेंगे । मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण महत्व यह है कि दु:खों का अंत होना चाहिए और मानवता का उन्नयन होना चाहिए।

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