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जितिया व्रत का पारण कितने बजे से है

जितिया व्रत का पारण कितने बजे से है

हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जितिया या जीवित पुत्रिका व्रत हर वर्ष आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की उदया अष्टमी तिथि पर किया जाता है। जितिया व्रत का पारण कितने बजे से हैअगले दिन यानि आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि के शुरू होने पर किया जाता है।

जितिया व्रत

जिउतिया, जितिया या जीवित पुत्रिका व्रत हिंदुओं का प्रमुख व्रत है। इस व्रत में हिन्दू माताएँ अपनी संतान की रक्षा, लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए पूरे दिन-रात का निर्जला व्रत रखती हैं।

हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जितिया या जीवित पुत्रिका व्रत हर वर्ष आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की उदया अष्टमी तिथि पर विधि-विधान से किया जाता है। जब प्रदोष काल में अष्टमी तिथि हो तो जीमूतवाहन की पूजा करनी चाहिए।

वैसे तो जितिया या जीवित पुत्रिका व्रत पूरे भारत में लोकप्रिय है किन्तु उत्तर भारत के उत्तर प्रेदेश, बिहार, झारखंड, एवं दिल्ली में यह व्रत विशेष रूप से मनाया जाता है। नेपाल में भी हिन्दू माताएँ इस व्रत में बड़ी श्रद्धा से पूजा-पाठ करती हैं।

आइए जानते हैं कि 2023 में जीतिया व्रत का पारण कितने बजे से है और जीतिया व्रत कथा क्या है?

जितिया व्रत कथा

जितिया व्रत कथा के दिन पुत्रवती माताएँ पूजा के बाद जीवित पुत्रिका व्रत कथा का श्रवण करती हैं। इसमें दो कथाएँ प्रचलित हैं। दोनों कथाओं को सुनने के बाद ही जीतिया व्रत का पारण किया जाता है। कथा कुछ इस प्रकार है:

जीमूतवाहन की जितिया व्रत कथा

जीवित पुत्रिका की पौराणिक व्रत कथा गन्धर्वों के परोपकारी राजकुमार जीमूतवाहन से जुड़ी हुई है। गन्धर्वों के राजकुमार जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा, दयालु और परोपकारी व्यक्ति थे। उनके पिता जब वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम जाने लगे तो जीमूतवाहन को राजा बनाया गया।

किन्तु कुछ समय बाद ही जीमूतवाहन ने अपने राज्य का त्याग कर दिया और वन में अपने वृद्ध पिता की सेवा के लिए चले गए। एक दिन उस वन में जीमूतवाहन को भ्रमण करते हुए एक रोती हुई वृद्धा मिली जो विलाप कर रही थी।

जीमूतवाहन ने उस वृद्धा से उनके दुख का कारण पूछा तो उन्होने रोते हुए अपना परिचय दिया। वृद्धा ने जीमूतवाहन को बताया कि वो नागवंशी स्त्री हैं जिनका एक ही पुत्र है। नागवंश के लोगों ने पक्षीराज गरुड से प्रतिज्ञा की थी कि वे प्रतिदिन गरुण को भक्षण के लिए एक नाग भोजन के रूप में प्रदान करेंगे। किन्तु आज मेरे पुत्र शंखचूर्ण को गरुड के समक्ष जाने का दिन है।

अपने एकमात्र पुत्र की मृत्यु के भय से मैं विलाप कर रही हूँ। नागमाता के विलाप से जीमूतवाहन का हृदय करुणा से भर गया। उन्होने तुरंत नागमाता से कहा कि आप चिंता न करें। आज आपके पुत्र के बदले गरुड के भोजन के लिए मैं जाऊंगा। वृद्धा को सांत्वना देकर जीमूतवाहन ने शंखचूर्ण के हाथ से लाल कपड़ा स्वयं ले लिया और उसे अपने शरीर पर लपेटकर गरुड की बाली के लिए स्वयं शीला पर एलईटी गए।

निश्चित समय पर गरुड आए और लाल कपड़े में ढके हुए जीमूतवाहन को अपना आहार समझकर अपने पंजों में दबोचकर उड़ गए। गरुड लाल कपड़ों में लिपटे जीमूतवाहन को लेकर एक पहाड़ पर बैठकर सोचने लगे कि आज इस नाग से कोई प्रतिकृया क्यों नहीं हो रही है। प्रतिदिन की भांति यह प्राणी अपने प्राणों की रक्षा के लिए छटपटा क्यों नहीं रहा है।

इतना सोचकर गरुड ने लाल कपड़े में से जीमूतवाहन को निकालकर देखा तो आश्चर्य में पड़ गए। उन्होने जीमूतवाहन से अपना परिचय बताने के लिए आग्रह किया। जीमूतवाहन ने गरुड से अपनी नागमाता से भेंट की सारी कथा सुना दी। गरुड जीमूतवाहन के साहस और दूसरों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने की भावना से बहुत प्रभावित हुए।

जीमूतवाहन के परोपकार की भावना से प्रसन्न होकर पक्षीराज गरुड ने नागों की बाली ना लेने का वरदान दे दिया। उन्होने जीमूतवाहन की प्रशंसा की और उन्हे जीवित जाने दिया।

इस प्रकार गंधर्वराज जीमूतवाहन के साहस और परोपकार से नागों की रक्षा हुई और तभी से संसार में अपने पुत्रों की रक्षा के लिए जीमूतवाहन की पूजा की शुरुआत हुई। जो पुत्रवती माताएँ हर वर्ष आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर विधि-विधान से व्रत करती हैं और जीमूतवाहन की व्रत कथा का श्रवण करती हैं, उनके पुत्रों की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं। जीतिया व्रत का पारण कथा सुनने के पश्चात अगले दिन किया जाता है।

चील और सियारिन की जीतिया व्रत कथा

किसी नगर में एक वीरान स्थान पर पीपल का पेड़ था। उस सुनसान पीपल के पेड़ पर एक चील रहा करती थी। उसी पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहा करती थी। दोनों सहेलियाँ थीं और एक दूसरे का साथ देती थीं।

चील और सियारिन ने एक बार कुछ स्त्रियॉं का देखकर जीउतिया का व्रत किया। किन्तु जिस दिन दोनों ने जीवित पुत्रिका व्रत किया था उसी दिन उस नगर में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उस मरे हुए व्यक्ति का शव उसी पीपल के पेड़ के पास पहुँच गया जैस्पर चील और सियारिन रहती थीं।

किन्तु जैसे-जैसे जीउतिया व्रत का समय बीतता गया सियारिन को वैसे-वैसे भूख प्यास सताने लगी। फिर पास में पड़े शव के मांस को देखकर वह यह भूल गई कि उसने जीतिया व्रत किया हुआ है। लेकिन दूसरी तरफ चील अपने व्रत के विधि-विधान पर अडिग रही और सामने मांस पड़े होने के बावजूद पूरी श्रद्धा से उपवास के नियमों का पालन किया। पूरे दिन और पूरी रात उपवास करने के बाद ही चील ने अगले दिन जितिया व्रत का पारण किया।

पूरे दिन और पूरी रात चील ने जीउतिया व्रत का पालन किया। सियारिन ने मांस खाकर अपना व्रत भंग कर दिया। किन्तु व्रत का महात्म्य ऐसा कि दोनों को ही अगले जन्म में मनुष्य का जन्म मिला। चील और सियारिन दोनों का कन्याओं के रूप में जन्म हुआ। अगले जन्म में चील सियारिन की बड़ी बहन अहिरावती बनी और सियारिन छोटी बहन कपुरावती बनी।

अहिरावती का विवाह राजा के साथ हुआ और वह रानी बनी तो दूसरी ओर सियारिन उसी राजा के छोटे भाई की पत्नी बनी। विवाह के बाद अहिरावती ने सात पुत्रों को जन्म दिया किन्तु कपुरावती की सभी सन्तानें जन्म लेते ही मर जाती थीं।

छोटी बहन यह बरदास्त ना कर सकी और उसने षड्यंत्र कर के अपनी बड़ी बहन के सातों पुत्रों के सर कटवा दिये। उसने सातों बच्चों के कटे हुए सर घड़ों में बंद कर के अहिरावती के पास भिजवा दिये।

भगवान जीमूतवाहन ने यह सब जघन्य पाप देखा और अहिरावती के जीउतिया व्रत के प्रभाव के कारण उनकी संतानों के कटे हुए सर के बदले मिट्टी के सर बना के लगा दिये। जीमूतवाहन ने उन मिट्टी के सरों पर अमृत छिड़ककर फिर से उन्हे जीवित कर दिया। जो कटे हुए सर कपुरावती ने भेजे थे वे सब फल बन गए। अहिरावती के सातों बच्चे घर लौट आए।

किन्तु बहुत समय बीत जाने पर भी कपुरावती को अहिरावती की संतानों की मृत्यु का समाचार नहीं मिला तो वह खुद ही पता लगाने के लिए अपनी बड़ी बहन के महल में गई।

अहिरावती के महल में अहिरावती के सातों पुत्रों को जीवित देखकर उसे अत्यंत आश्चर्य हुआ और वह पछताने लगी। उसने अपनी बड़ी बहन को पूरी बात बताई। भगवान जीमूतवाहन की कृपा से अहिरावती को पिछले जन्म की पूरी बात याद आ गई और वह अपनी छोटी बहन कपुरावती को साथ लेकर नगर के उसी वीरान पीपल के पेड़ के नीचे गई।

उस पीपल के पेड़ के नीचे जाते ही कपुरावती को बहुत दुख और पश्चाताप हुआ। वहीं शोक और हताशा से उसके प्राण चले गए। जब राजा को यह सब ज्ञात हुआ तो उन्होने उसी पेड़ के नीचे कपुरावती का अंतिम संस्कार कर दिया। इस प्रकार जीतिया व्रत कथा का विधिवत पालन करने और जीमूतवाहन की पूजा के प्रभाव से अहिरावती के सातों पुत्र जीवित रहे और सियारिन को पछताना पड़ा। इसलिए जितिया व्रत का उपवास ठीक ढंग से करना चहाइए और अगले दिन ही जितिया व्रत का पारण करना चाहिए।

जितिया व्रत कब है 2023

हिन्दू पंचांग के अनुसार जीवित पुत्रिका व्रत हर वर्ष आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की उदया अष्टमी तिथि पर किया जाता है। इस वर्ष 2023 में जीतिया व्रत 6 अक्टूबर दिन शुक्रवार को है।

जीतिया व्रत की अष्टमी तिथि प्रारम्भ – अक्टूबर 06, 2023 को सुबह 06:34  बजे

जीतिया व्रत की अष्टमी तिथि समाप्त – अक्टूबर 07, 2023 को सुबह 08:08 बजे (जितिया व्रत का पारण का समय)

2023 में जितिया कब है

2023 में जीतिया व्रत 6 अक्टूबर 2023 दिन शुक्रवार को है। इस दिन पुत्रवती माताएँ सुबह भोर से व्रत का पालन करेंगी। अष्टमी तिथि अगले दिन यानि 7 अक्टूबर 2023 को सुबह आठ बजकर 8 मिनट तक रहेगी।

जीतिया व्रत में व्रत करने वाली स्त्रियाँ अपने गले में लाल रंग के धागे में जीतिया लॉकेट भी पहनती हैं।

जितिया का पारण कब है 2023

जितिया व्रत का पारण कितने बजे से है-जीतिया व्रत का पारण व्रत के दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ती के पश्चात किया जाता है। इसलिए 2023 में जीतिया व्रत का पारण 7 अक्टूबर 2023 के दिन सुबह 8 बजकर 8 मिनट के बाद अष्टमी तिथि समाप्त हो जाने पर किया जाएगा। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि जीवित पुत्रिका या जीउतिया व्रत का पारण नवमी तिथि में ही किया जाना चाहिए।

जितिया त्योहार का पारण कैसे किया जाता है

  • जीतिया व्रत का पारण व्रत के अगले दिन भगवान सूर्य को जल का अर्घ्य देने के बाद किया जाता है।
  • सुबह स्नान-ध्यान करने के पश्चात व्रत करने वाली महिलाओं को अष्टमी तिथि की समाप्ती के बाद पूजा-पाठ करने के बाद ही अन्न-जल और भोजन ग्रहण करना चाहिए।
  • जीतिया व्रत का पारण करने के लिए मरुवा की रोटी, नोनी का साग और झोर भात खाकर किया जाता है।
  • कुछ लोग इस व्रत के पारण में गाय के दूध का इस्तेमाल भी करते हैं। व्रत का पारण करने के बाद किसी योग्य ब्राह्मण को दान देने का भी विधान माना जाता है। दान देने से आपका व्रत पूर्ण माना जाता है।

जितिया व्रत का पारण कितने बजे से है?

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि 2023 में जीतिया व्रत का पारण 7 अक्टूबर 2023 के दिन सुबह 8 बजकर 8 मिनट के बाद अष्टमी तिथि समाप्त हो जाने पर किया जाएगा। व्रत करने वाली स्त्रियाँ जीतिया व्रत का पारण अष्टमी तिथि की समाप्ती के बाद करेंगी।

जितिया का व्रत करने, उसकी कथा सुनने और विधि-विधान से पारण करने से मनुष्य को पुत्र-पौत्रों का कष्ट नहीं होता। यह व्रत महान फल देने वाला है। 

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