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जागरूकता


दुनिया के सभी धर्मो एवं आध्यात्मिक पद्धतियों के अध्ययन के पश्चात् जो एक चीज सबसे महत्वपूर्ण रूप में सामने आती है वह है -जागरूकता | जागरूकता ही होश की अवस्था है | जागरूकता में किसी तथ्य या परिस्थिति के प्रति होश की अवस्था में रहना होता है |
जागरूकता का अर्थ स्वयं के प्रति एवं वाह्य वातावरण दोनों के प्रति होश की अवस्था का होना है | हममें से अधिकांश मनुष्य न तो स्वयं के प्रति और न ही वाह्य वातावरण के प्रति ही जागरूक है | जीवन यन्त्रवत है या बेहोशी की अवस्था जैसा है | भोजन करते है लेकिन पता नहीं क्या खाया | पानी पीते है लेकिन पता नहीं क्या पिया | किसी को अपशब्द बोल रहे है लेकिन पता नहीं क्या बोला | फूलों के बाग़ से गुजर रहे है लेकिन उसकी सुगंध का होश नहीं | बच्चे की किलकारी गूंज रही है , लेकिन उसके अस्तित्व का अहसास नहीं होता | यही बेहोशी या प्रमाद की अवस्था है | जीवन जैसे बेहोशी में ही बीता जा रहा है |

चेतनता को पाने के लिए जागरूक रहना अनिवार्य है | योगी पुरुषों और साधकों के लिए चेतनता ही ईश्वर है क्योंकि मान्यता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का उद्भव एक सुप्रीम कॉन्शसनेस से ही हुआ है | चेतनता , एनर्जी का ही स्वरूप है तथा एनर्जी और मैटर एक दूसरे से जुड़े हैं | लगभग ढाई हजार साल पहले भगवान बुद्ध को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई थी | उन्होंने अनुभव के आधार पर कहा था कि ” सबो लोको प्रकम्पितो ” ( द व्होल यूनिवर्स इस वाइब्रेशन ) | तरंग अर्थात वाइब्रेशन, एनर्जी का ही एक स्वरूप है| पिछली सदी में अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने उर्जा -पदार्थ समीकरण में E =mc 2 का सिद्धांत दिया जिसमे ऊर्जा और पदार्थ एक दूसरे से जुड़े हुए हैं |

योगी और साधक मेडिटेशन और माइंडफूलनेस के अभ्यास द्वारा मन और मन में उठने वाले विचारों को हमेशा देखते (ऑब्ज़र्ब ) रहते हैं | केवल मन एवं विचार ही नहीं बल्कि शरीर और शरीर पर अनुभव हो रहे संवेदना को भी देखते रहते हैं | मन और शरीर की इन संवेदनाओं के प्रति बिना कोई प्रतिक्रिया किए अर्थात समता भाव जिसमें ना तो राग न हीं द्वेष होता है -से होश की अवस्था मे रहना परम ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है | जागरूकता या कॉन्शसनेस की अवस्था एक वेवफॉर्म या तरंग के रूप में ही है | यही तरंग संपूर्ण ब्रह्मांड में भी मौजूद है | इसलिए उसकी अवस्था में होना सारे प्राणी मात्र जीव-अजीव सभी से जोड़ देता है|
जागरूकता के अभ्यास से कॉन्शसनेस की स्थिति उत्पन्न होती है | लेकिन माया के भ्रम के कारण इगो या अहं की स्थिति बनी रहती है | लगातार अभ्यास एवं ज्ञान से एक स्थिति आती है जब अहं पूरी तरह ही समाप्त हो जाता है | इसके पश्चात ही सुप्रीम कॉन्शसनेस से एकीकरण हो पाता है | इसे ही परम ज्ञान या इनलाइटेनमेंट की अवस्था कहते हैं | विश्व में जिनको भी परम ज्ञान का अनुभव हुआ उन्होंने जागरूकता या होश पूर्ण जीवन के पथ का ही अनुसरण किया है |

सबसे बड़ा प्रश्न है कि जागरूकता या होश को कैसे साधा जाए | जीवन में जो भी अभी वर्तमान का क्षण है उसमें जागरूक रहा जा सकता है | मनुष्य के मन को ‘मंकी माइंड’ कहा जाता है | यह मंकी माइंड कभी नहीं चाहता कि कोई इसे ऑब्जर्व करें | लेकिन हम मन नहीं है क्योंकि हम मन और उसमें जो विचार उठते हैं उसको भी देख पाते हैं | हम मालिक हैं तथा मन को नौकर के रूप में आज्ञा माननी चाहिए| लेकिन जागरूकता के अभाव में मन ही घर का मालिक बन बैठा है | जब नौकर घर का मालिक बन बैठे और मालिक बेहोश हो तो घर का सत्यानाश हो सकता है | जागरूक रहने के लिए अलग से कुछ नहीं करना है | जिस क्षण में जो काम हो रहा है उसे ऑब्जर्व करते रहना है | काम करते हुए, खाना खाते हुए, बात करते हुए, टहलते हुए जागरूक रहकर किया जा सकता है| ध्यान की अवस्था अर्थात मेडिटेशन करते हुए मन और शरीर पर उठे किसी भी प्रकार की संवेदना के प्रति जागरूक रहा जाता है | ध्यान में आती-जाती सांस को देखने के प्रयास से यह पुष्ट होता है | सांस पर ध्यान टिकाए रखना भी आसान नहीं होता | प्रारम्भ में तो कुछ सेकेंड में ही मंकी माइंड कहीं और भाग जाता है लेकिन इसे पकड़ कर फिर से काम पर लगाना होता है | जागरूक होने की प्रक्रिया ऐसे ही प्रारंभ होती है | जीवन का सबसे गूढ़ सूत्र यही है कि जितना जीवन शेष है उसके प्रत्येक दिन और प्रत्येक दिन के प्रत्येक क्षण को जागरूक रहते हुए जिया जाए |


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