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करवा चौथ व्रत कथा

करवा चौथ व्रत कथा

करवा चौथ व्रत कथा या करक चतुर्थी का व्रत सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु और भाग्य के लिए करती हैं। यह व्रत महिलाएं न सिर्फ अपने पति की लंबी आयु के लिए बल्कि पुत्र, पौत्र, धन और अपने परिवार की चिरस्थायी समृद्धि और सौभाग्य के लिए भी करती हैं।

करवा चौथ व्रत

करवा चौथ का व्रत करने वाली स्त्रियॉं इस दिन करवा चौथ व्रत कथा सुनती हैं जिससे उन्हे पुण्य फल की प्राप्ति होती है और उनके पति को लंबे जीवन का आशीर्वाद मिलता है।

वैसे तो सिनेमा और टीवी शो में इस व्रत को बहुत ही चढ़ा-बढ़ा के दिखाया जाता है। इसे ग्लैमर के साथ जोड़ दिया गया है। किन्तु इस व्रत को पवित्रता और सादगी से ही करना चाहिए। इस व्रत के दौरान महिलाएं माता गौरी और चौथ माता की भी पूजा करती हैं जो करवा चौथ के दिन स्वयं देवी पार्वती का प्रतिरूप मानी जाती हैं।

करवा चौथ व्रत और करवा चौथ व्रत कथा का उल्लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु और व्रतराज सहित हिन्दू धर्म की कई धार्मिक पुस्तकों में मिलता है।

करवा चौथ व्रत कब है 2022

हिन्दू पंचांग के अनुसार करवा चौथ का व्रत कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। इसी दिन को संकष्टि चतुर्थी भी कहा जाता है। इस वर्ष यानि 2022 में करवा चौथ का व्रत 13 अक्टूबर 2022 दिन गुरुवार को है। इस वर्ष 13 अक्टूबर को करवा चौथ की पूजा का मुहूर्त शाम 5 बजकर 54 मिनट से लेकर शाम 7 बजकर 09 मिनट तक है।

व्रतराज के अनुसार करवाचौथ की पूजा का सबसे सही समय संध्या का समय माना जाता है जब भगवान सूर्य अस्त हो चुके होते हैं। करवा चौथ की पूजा माता पार्वती और भगवान शिव शंकर की कृपा प्राप्त करने के लिए की जाती है।

करवा चौथ तारीख और शुभ मुहूर्त

करवा चौथ तिथि: गुरुवार, अक्टूबर 13 2022                                                                                           करवा चौथ पूजा मुहूर्त: शाम 5 बजकर 54 मिनट से लेकर शाम 7 बजकर 09 मिनट तक                                अवधि: 1 घंटा 15 मिनट                                                                                                                      करवा चौथ उपवास काल या समय: सुबह 06: 20 से रात्रि 08:09 तक (अवधि 13 घंटे 49 मिनट)                            करवा चौथ के दिन चंद्रोदय का समय: रात्रि 08:09

करवा चौथ व्रत की धार्मिक मान्यता

करवा चौथ का व्रत सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु और सुखी जीवन के लिए करती हैं। इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। मान्यता के अनुसार शिव-पार्वती के साथ-साथ गणेश और कार्तिकेय की भी आराधना की जाती है।

चूंकि देवी पार्वती अखंड सौभाग्यवती हैं इसलिए पूजा के दौरान सबसे पहले उनही की आराधना की जाती है। माता पार्वती की पूजा के बाद ही भगवान शिव, भगवान कार्तिकेय और भगवान गणेश की पूजा की जाती है।

इस व्रत को करवा चौथ का व्रत इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें करक या करवा का इस्तेमाल होता है। करक और करवा दोनों छोटे घड़े को कहा जाता है जिसे पूजा के दौरान इस्तेमाल किया जाता है और परिवार की भलाई के लिए दान के रूप में दिया जाता है।

करवा चौथ व्रत किसे करना चाहिए?

करवा चौथ का व्रत करने का अधिकार केवल सुहागिन स्त्रियॉं को है। पुरुष इस व्रत को नहीं कर सकते। जो अविवाहित युवतियाँ हैं वे भी इसका व्रत नहीं कर सकतीं। हालांकि किसी अविवाहित कन्या ने किसी व्यक्ति को मन ही मन अपना पति मान लिया हो तो वो इस व्रत का पालन कर सकती है। किन्तु विवाहित महिलाएं ही इस व्रत को करें तो उत्तम माना जाता है।

करवा चौथ का व्रत मुख्य रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश राज्यों की हिन्दू सुहागिन स्त्रियाँ मनाती हैं। किन्तु धीरे-धीरे यह व्रत अन्य राज्यों और विदेशों में रहने वाली भारतीय हिन्दू स्त्रियॉं के बीच भी लोकप्रिय हो चुका है।

करवा चौथ व्रत की कहानी

करवा चौथ के व्रत के दिन इस कथा को सुनना चाहिए-

प्राचीन काल में इंद्रप्रस्थ नाम का एक नगर हुआ करता था। इस नगर में एक वेदपाठी ब्राह्मण वेदशर्मा रहा करते थे। वेदशर्मा की पत्नी का नाम लीलावती था और इस दंपति को सात पुत्र और एक पुत्री थीं। उनकी पुत्री का नाम वीरावती था जो एक गुणवान और संस्कारी कन्या थी।

परिवार में सात भाइयों के बीच अकेली कन्या होने के कारण वीरावती सभी भाइयों और अपने माता-पिता की बहुत लाड़ली थी। उसे उसके माँ-बाप ने बहुत स्नेह से पाला था। समय के साथ वीरवाती भी युवती हुई और विवाह के योग्य हो गई। वीरावती के माता-पिता ने उसका विवाह एक योग्य ब्राह्मण कुमार के साथ कर दिया।

शादी के बाद वीरावती एक बार जब अपने मायके आई हुई थी तो करवा चौथ व्रत का अवसर आया। वीरावती की भाभियों ने भी करवा चौथ का व्रत करने का संकल्प लिया जिससे वीरवाती के मन में भी करवा चौथ का व्रत करने की इच्छा हुई।

उसने भी अपनी भाभियों के साथ अपने पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा। किन्तु वीरावती को करवा चौथ के उपवास के दौरान भूख के कारण अधिक कमजोरी हो गई और वो इस व्रत को सह नहीं सकी। शीघ्र ही वह व्रत के दौरान मूर्छित हो गई।

वीरावती के इस प्रकार से मूर्छित हो कर गिर जाने से उसके सभी भाई चिंतित हो उठे। वे जानते थे कि उनकी बहन की ये हालत करवा चौथ का निर्जला व्रत करने के कारण हुई है क्योंकि वो इस व्रत में भूख प्यास नहीं संभाल पाई।

किन्तु वे ये भी जानते थे कि उनकी बहन एक पतिव्रता नारी है जो बिना चंद्रमा का दर्शन किए कुछ भी खाएगी पिएगी नहीं। हालांकि बेहोश पड़ी बहन को ठीक करने और उसे भोजन कराने के लिए वीरावती के भाइयों ने एक युक्ति निकाली और अपनी बहन के साथ छल करके उसे व्रत तोड़ने की योजना बनाई।

वीरावती का एक भाई कुछ दूरी पर स्थित वट के पेड़ के ऊपर चढ़ गया। उसने अपने हाथ में एक छलनी और एक हाथ में दीपक लिया हुआ था। उधर वीरावती के होश में आने पर उसके बाकी भाइयों ने उसे बताया कि चंद्रोदय हो गया है और वो चंद्रमा का दर्शन कर सकती है।

चंद्रमा का दर्शन करने के लिए वीरावती घर की छट पर गई जहां उसे वट वृक्ष पर छलनी के पीछे से दीपक दिखाई दिया। दूरी होने के कारण वीरावती ने उस दीपक को ही चंद्रमा समझ लिया और अर्घ अर्पण कर अपने व्रत को खोल दिया। किन्तु व्रत को समाप्त कर वीरावती जैसे ही भोजन करने लगी वैसे ही उसे अशुभ संकेत मिलने लगे।

भोजन करने के लिए जैसे ही वीरावती ने पहला कौर उठाया तो उसमें बाल मिला। दूसरे कौर में उसे छींक आ गई और तीसरे कौर मुंह में डालते वक्त उसके ससुराल से निमंत्रण के रूप में बुलावा आ गया। जल्दबाज़ी में वीरावती जैसे ही अपने ससुराल पहुंची उसे अपने पति की मृत्यु का पता चला और उसका शव देखने को मिला।

अपने पति को मृत देखकर वीरावती अत्यंत व्याकुल होकर रोने लगी और सोचने लगी कि शायद करवा चौथ के व्रत में उससे कोई भूल हुई है जिसके कारण उसके पति की मृत्यु हुई है। किन्तु उसका विलाप और रुदन इतना मार्मिक था कि स्वयं देवराज इन्द्र की पत्नी इंद्राणी द्रवित हो उठीं और वीरावती को सांत्वना देने के लिए चली आयीं।

देवराज इन्द्र की पत्नी इंद्राणी को अपने सम्मुख देखकर वीरावती और विलाप करने लगी और उनसे पूछने लगी कि मेरे करवा चौथ का व्रत करने के बावजूद व्रत के दिन ही पति की मृत्यु क्यों हुई? वीरावती इंद्राणी से अपने पति को पुनः जीवित करने की विनती करने लगी।

उसकी विनती सुनकर इंद्राणी ने उसे बताया कि कैसे उसने चंद्रमा का दर्शन किए बिना ही और उन्हे अर्घ दिये बिना ही करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया था जिसके कारण उसके पति की मृत्यु हुई है।

देवी शची (इंद्राणी) ने वीरावती से कहा कि यदि वह हर महीने की चौथ को व्रत करे और साल में एक बार पड़ने वाले करवा चौथ का व्रत विधिपूर्वक करे तो उसका पति पुनः जीवित लौट आएगा।

इसके बाद वीरावती ने पूरे विश्वास के साथ प्रत्येक महीने माह की चौथ को और करवा चौथ के व्रत को विधिपूर्वक सम्पन्न किया। उसके पुण्य के फलस्वरूप उसका पति उसे पुनः जीवित प्राप्त हुआ।

करवा चौथ व्रत की विधि

करवा चौथ व्रत करने से पहले उसकी सम्पूर्ण पूजा विधि जान लेनी चाहिए। इस व्रत के दिन महिलाओं को प्रात:काल स्नान करने के बाद अपने पति और परिवार की भलाई के लिए व्रत रखने का संकल्प करना चाहिए। बिना संकल्प के हिन्दू धर्म में कोई भी व्रत या पूजा नहीं की जाती।

संकल्प के दौरान यह निश्चय किया जाता है कि चंद्रमा को देखकर ही व्रत तोड़ा जाएगा। संकल्प लेते समय इस मंत्र का जाप करना चाहिए-

मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।

अर्थात मैं अपने सुख, भाग्य, पुत्रों और पौत्रों और अन्य स्थिर समृद्धि

की प्राप्ति के लिए करक चतुर्थी व्रत का पालन करूंगी।

इस व्रत को करने कि विधि ये है:

  • करवा चौथ के व्रत के दिन सुहागिन स्त्रियॉं को सूर्योदय से पहले ब्रह्मवेला में उठकर स्नान-इत्यादि नित्यकर्म कर लेना चाहिए।
  • इस दिन बिना अन्न-जल के व्रत का विधान है अतः दिन भर कुछ भी खाना पीना नहीं चाहिए।
  • मन में पवित्र भाव से माता पार्वती और भगवान शिव के प्रति निष्ठा रखें क्योंकि करक चतुर्थी पर किया जाने वाला उपवास और पूजा मुख्य रूप से देवी पार्वती को समर्पित है।
  • शाम को पूजा के दौरान सबसे पहले देवी गौरा उसके बाद भगवान शिव, भगवान कार्तिकेय और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। साथ में चौथ माता की भी पूजा की जाती है।
  • करवा चौथ के एक दिन पहले मेहंदी लगाना चाहिए। पैरों और हाथों में महावर या अलता लगाएँ।
  • करवा चौथ करने वाली महिला को शाम में होने वाली करवा चौथ पूजा से पहले दुल्हन की तरह कपड़े पहन कर सजना चाहिए।
  • पूजा के समय करवा चौथ कथा का श्रवण करना चाहिए।
  • चाँद के निकलने के बाद चलनी या पारदर्शी कपड़े से चाँद देखना चाहिए।
  • चंद्र देव को जल के रूप में अर्घ्य अर्पित करें।
  • चाँद देखने के बाद पति को देखना होता है।
  • पति का दर्शन करने के बाद पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत तोड़ा जाता है।
  • पूजा के बाद पहले से तैयार किए गए भोजन को ग्रहण किया जाता है।

करवा चौथ में मायके से क्या आता है

करवा चौथ के अवसर पर बहू के मायके से जो सामान आता है उसे बाया कहा जाता है। बाया में मिठाइयां, फल, मेवे, कपड़े, बर्तन, चावल आदि भेजे जाते हैं। लड़की की ससुराल में बाया करवा चौथ की कथा होने से पहले भेज दिया जाता है।

पहली बार करवा चौथ का व्रत शुरू करने वाली स्त्रियॉं के मायके से बाया आना जरूरी माना जाता है।

करवा चौथ के अवसर पर बहू को सास सरगी उपहार में देती है। सरगी में मिठाइयाँ, कपड़े और शृंगार इत्यादि का समान दिया जाता है। कहीं-कहीं ऐसी भी मान्यता है कि बहू अपनी सास को सदी और शृंगार की सामाग्री भेंट करती है। इसी को ओटी भरना कहा जाता है।  

करवा चौथ व्रत की पूजा कैसे करें

शास्त्रों के अनुसार करवा चौथ व्रत की पूजा का सर्वोत्तम समय सूर्यास्त के पश्चात संध्या में होता है। चूंकि सूर्यास्त का समय अलग-अलग शहरों में अलग-अलग हो सकता है इसलिए अपने क्षेत्र के अनुसार सूर्यास्त का समय जानकार ही पूजा का समय निश्चित करना चाहिए।

करवा चौथ की पूजा के दिन माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है। अधिकतर महिलाएं इस व्रत की पूजा समूह में करती हैं और इस अवसर पर करवा चौथ महात्म्य की कथा का श्रवण करती हैं।

  • इस दिन विवाहित महिलाएं को अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे भाग्य के लिए एक दिन का उपवास रखना चाहिए।
  • करवा चौथ का व्रत नीराजल व्रत होता है अर्थात इस दिन सुबह से लेकर रात में चंद्रमा का दर्शन किए बगैर पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करनी चाहिए।
  • शास्त्रों के अनुसार करवा चौथ का व्रत केवल विवाहित महिलाएं ही करती हैं।
  • करवा चौथ की पूजा देवी पार्वती का आशीर्वाद पाने के लिए की जाती है। सुहागिन स्त्रियाँ या तो देवी गौरा और चौथ माता की आकृति दीवार पर खींचती हैं या माता पार्वती की पूजा करने के लिए चौथ माता की फोटो या कलेंडर का उपयोग करती हैं।
  • करवा चौथ की पूजा में चंद्र को अर्घ देने के बाद करवा के माध्यम से अपने पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत का पारण करना चाहिए। छलनी में अपने पति को देखना भी नहीं भूलना चाहिए।
  • पूजा के बाद किसी ब्राह्मण या किसी पात्र स्त्री को करवा दान के रूप में देना चाहिए।

करवा चौथ में माता पार्वती की पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करना चाहिए-

नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌।

प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥

इस मंत्र का अर्थ है कि

” हे भगवान शिव की प्रिया कृपया अपनी नारी भक्तों

सुंदर पुत्र और उनके पतियों को लंबी आयु दें”।

करवा चौथ के दिन करवा में क्या भरा जाता है?

करवा चौथ व्रत का नाम करवा या करव के नाम पर पड़ा है। लेकिन अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि करवा में क्या भरना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार करवा चौथ के व्रत के दिन करवा में साफ जल या दूध भरना चाहिए। इस करवा में दूध या जल भरकर उसमें सामर्थानुसार सिक्के अथवा स्वर्ण, हीरे या अन्य कीमती पत्थर भी डाले जा सकते हैं।

किन्तु यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि करवा में जो भी डाला जाता है उसे किसी ब्राह्मण या पात्र स्त्री को दान दे दिया जाता है।

करवा चौथ व्रत इस वर्ष 2022 में 13 अक्टूबर के दिन है। इस व्रत के दौरान महिलाओं को करवा चौथ महात्म्य कथा सुननी चाहिए। करवा चौथ का व्रत कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के उसी दिन किया जाता है जिस दिन संकष्ठी चतुर्थी का पर्व होता है। संकष्ठी का पर्व भगवान गणेश को समर्पित है।

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