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कबीर दास का जीवन परिचय

कबीर दास का जीवन परिचय

कबीर दास का जीवन परिचय के पूर्व कबीर के व्यक्तित्व और उनके कृत्तित्व का गहन ज्ञान आवश्यक है | कबीर दास का जीवन एक ऐसे भक्त कवि का चित्रण प्रस्तुत करता है जो स्वभाव से विद्रोही-प्रकृति का है, क्रांतिकारी है, समाज-सुधारक है, रहस्यवादी साधक है और इन सब के होते हुए भी एक सरल हृदय भक्त है। वे भक्तिकाव्य की निर्गुणधारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं।

वैसे तो कबीरदास के विषय में तरह-तरह की कहानियाँ और लोककथाएँ प्रचलित हैं लेकिन इस युग प्रवर्तक महान कवि के जीवन का ऐसा कोई लेख उपलब्ध नहीं है जो प्रमाणित हो।

कबीरदास अपनी शिक्षा से समाज में व्याप्त अंध-विश्वासों, आडंबरों और कुरीतियों को तोड़ने का काम करते रहे। कबीरदास पढे-लिखे नहीं थे और शास्त्र-ज्ञान को प्रेम के आगे तुच्छ मानते थे। निर्गुण और निराकार ईश्वर में विश्वास रखने वाले कबीरदास अपने साहित्य के माध्यम से भी ब्रह्म और जगत को एक ही रूप में देखते हैं।

15वीं शताब्दी के इस महान समाज-सुधारक भक्त-कवि का जीवन परिचय और साहित्यिक रचनाओं के बारे में बताता यह लेख कबीरदस के कुछ प्रमुख दोहों और पदों से भी आपको परिचित कराएगा। 

कबीर दास का जीवन परिचय

कबीरदास का जन्म कब और किसके गर्भ से हुआ यह कहना कठिन है। इस विषय में कई किवदंतियाँ प्रचलित हैं।

आचार्य हजारिप्रसाद द्विवेदी, बाबू श्यामसुंदरदास और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार कबीरदास का जन्म सन 1399 इसवीं (संवत 1456) में हुआ था। जबकि डॉ पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल का मानना है कि कबीर का जन्म सन 1370 इसवीं में हुआ था।

कबीर के जन्म संबंधी जो भी विवाद हों किन्तु एक बात निश्चित है कि उनके जीवन का अधिकतर समय 15वीं सदी के शुरुआत में बिता था।

विद्वानों का मानना है कि कबीरदास का जन्म काशी में हुआ था। हालांकि कुछ विद्वान कबीर के जन्म स्थान के रूप में मगहर को भी पहचानते हैं। किन्तु वे एक लंबे समय तक काशी में रहे थे और स्वयं कबीर ने अपने आप को “काशी का जुलाहा” कह कर संबोथित किया है।

ऐसी लोकमान्यता है कि कबीर का जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था जिसने लोक-लाज के चलते और सामाजिक अपमान से बचने के लिए नवजात शिशु को लहरतारा तालाब की सीढ़ियों पर छोड़ दिया था।

लहरतारा तालाब की सीढ़ियों पर पड़े इस शिशु को नीरू और नीमा नाम के मुस्लिम जुलाहे दंपति ने पाला पोसा।

कबीरदास के जीवन की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना है गुरु रामानन्द से भेंट होना। संत रामानन्द के शिष्यों में कबीरदास भी थे। कबीरदास के साहित्य में “लोई” शब्द का कई बार उल्लेख मिलता है जिन्हे उनकी पत्नी माना जाता है।

किन्तु कबीर विवाहित थे या नहीं यह कहना भी मुश्किल है। किंवदंती यह भी है कि कबीरदास की दो सन्तानें थीं-एक पुत्र कमाल और एक पुत्री कमाली। हालांकि एक बात निश्चित है कि कबीरदास पेशे से जुलाहे का काम करते थे और यही उनके परिवार के भरण पोषण का जरिया था।

कबीर के साहित्य में एक प्रकार का फक्कड़पन है जिसका सुर विद्रोही है। वे ना तो किसी से डरते थे और ना ही अपनी बात कहने के लिए कभी संकोच करते थे। धार्मिक अंधविश्वासों और आडंबरों पर तो मानो वो कुठराघात करते थे।

यही कारण है कि कबीरदास को अपने जीवनकाल में राजकीय असंतोष और कोप का भागी होना पड़ा। दिल्ली पर उस दौर में सिकंदर लोदी का शासन था जिसने कबीरदास को काफी परेशान किया। उनके धार्मिक विचारों से उनके कई दुश्मन भी बन गए थे।

बाहरी दिखावे और कुरीतियों का विरोध करने वाले कबीर हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। स्वयं उनके गुरु रामानन्द एक हिन्दू थे और उनका लालन-पोषण मुस्लिम परिवार में हुआ था।

जीवनभर रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर कटाक्ष करने वाले कबीरदास ने मृत्यु के समय भी ऐसा ही किया। ऐसी मान्यता थी कि काशी में मरने से मुक्ति मिलती है और मगहर में मरने से नर्क। बस इसी अंधविश्वास को तोड़ने के लिए कबीर अंत समय में मरने के लिए मगहर चले गए जहां उनकी मृत्यु हुई। उन्होने कहा भी

“जो कासी तन तजै कबीरा, तो रामहि कहाँ निहोरा रे।“

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार कबीरदास की मृत्यु 1518 इसवीं में हुई थी।

कबीर दास का जीवन परिचय : बचपन

कबीरदास के बचपन के बारे में सिर्फ इतना ज्ञात है कि उनका लालन-पोषण नीरू और नीमा नाम के मुस्लिम जुलाहे परिवार ने किया था। हालांकि यह जुलाहा परिवार अभी नया-नया ही मुस्लिम बना था इसलिए इसके संस्कारों पर पहले के नाथ-पंथी योगियों का प्रभाव शेष था।

यही कारण है कि कबीर को बचपन से ही हिन्दू-मुस्लिम धर्म के कर्मकांडों को समझने का मौका मिला। किन्तु इसके साथ ही अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से बालक कबीर ने दोनों धर्मों में व्याप्त अंधविश्ववासों को भी परखा।

कबीर जैसे-जैसे बड़े होते गए उनके अंदर का फक्कड़ दार्शनिक भी रोज़मर्रा के धार्मिक और सामाजिक कुरीतियों का बहिष्कार करने लगा।

कबीर दास का जीवन परिचय : शिक्षा

विद्वानों का मत है कि कबीरदास अनपढ़ थे। उन्हे शिक्षा का अवसर नहीं मिला। किन्तु अनपढ़ होते हुए भी वे जिस तरीके से ब्रह्म और ईश्वर की रहस्यमय बातें करते हैं, इससे उनके उच्च आध्यात्मिक अनुभव का पता चलता है।

कबीर के ऊपर अलग-अलग प्रान्तों और राज्यों से आए हुए साधुओं, फकीरों, जोगियों, साधकों और तपस्वियों का गहरा असर देखने को मिलता है। यह प्रभाव उनकी काव्य भाषा में भी सधुक्कड़ी के रूप में देखने को मिलता है। लेकिन कबीर किसी शिक्षा या शास्त्रों के मोहताज नहीं दिखाई देते। बल्कि वे तो खुद ही अपने आप में एक युग हैं जिसका ज्ञान किताबों और शास्त्रों से परे है। 

कबीर दास का जीवन परिचय : गुरु

कबीर के जीवन में गुरु का बहुत महत्व माना जाता है। संत रामानन्द कबीरदास के गुरु थे। कबीरदास ने स्वयं अपने संग्रह “साखी” में गुरु की महिमा बताते हुआ माना है कि अगर सतगुरु की कृपा ना होती तो वो भी पत्थर की पूजा कर रहे होते।

विद्वानों के बीच मान्यता है कि रामानन्द कबीर के गुरु थे। किन्तु कबीरदास की ऐसी एक भी रचना नहीं मिलती है जो प्रमाणित हो और जिसमें उनके गुरु के नाम के रूप में रामानन्द का उल्लेख हो। कबीर कभी अपने विवेक को और कभी ईश्वर को अपना गुरु बताते हैं।

ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि हिन्दू गुरु-शिष्य परंपरा में गुरु को ईश्वर तुल्य माना जाता है। गुरु और परमात्मा में कोई भेद नहीं माना जाता। कबीरदास ने अपने गुरु की महिमा का बार-बार बखान किया है। वे कहते हैं कि गुरु तो गोविंद से भी बड़ा है क्योंकि गुरु की महिमा से ही गोविंद अर्थात ईश्वर के दर्शन हुए हैं।

कबीर ने रामानन्द से भले ही “रामनाम” की दीक्षा ली थी किन्तु कबीर के लिए राम का अर्थ वह नहीं था जो अन्य सगुण भक्त कवियों के लिए था। उनके राम तो निर्गुण और निराकार ब्रह्म थे जो अनिर्वचनीय थे।

कबीरदास की साहित्यिक रचनाएँ

कबीरदास पढे-लिखे नहीं थे जिसके कारण उनके द्वारा लिखे गए पदों को उनके शिष्यों ने लिपिबद्ध किया था। वैसे तो कबीरदास के नाम से कई साहित्यिक पुस्तकों का उल्लेख मिलता है। लेकिन उनमें से कौन-सी कबीरदास ने लिखी हैं और कौन सी नहीं, यह कहना कठिन है।

कबीर के पदों की प्रामाणिकता को लेकर विद्वानों में मतभेद है। ऐसी मान्यता है कि कबीर के कुछ पद सिख धर्म के ग्रंथ “गुरु ग्रंथ साहब” में भी मिलते हैं।

कबीर के दोहों को संग्रहीत करने की शुरुआत उनके शिष्यों ने की जो बाद में भी चलती रही। यही कारण है कि इन संग्रहों में कुछ ऐसे पद भी शामिल हो गए जो स्वयं कबीर ने नहीं लिखे थे।

कबीर के पदों को इकठ्ठा कर के संपादित करने और प्रकाशित करने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य बाबू श्यामसुंदर दस ने किया। इसे “कबीर ग्रंथावली” के नाम से जाना जाता है। बाबू शायामसुंदर दास के अतिरिक्त श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय और डॉ रामकुमार वेरमा इत्यादि ने भी कबीर के पदों को संपादित कर प्रकाशित करने का काम किया है।

कबीरदास का जीवन परिचय उनके शिष्य धर्मदास के विवरण के बिना अधूरा है। कबीर के प्रमुख शिष्य “धर्मदास” ने ही सबसे पहले कबीर की बानियों या पदों का संग्रह तैयार किया जिसे “बीजक” कहा जाता है।

यहाँ बीजक का अर्थ है “गुप्त धन बताने वाली सूची”। इस विषय में कबीर ने स्वयं कहा है:

बीजक बित्त बतावई, जो बित्त गुप्ता होय।                                                            

    सबद बतावै जीव को, बुझे विरला कोय।।

बीजक के तीन भाग हैं:–

साखी

सबद

रमैनी

कबीरदास की भाषा शैली

कबीरदास ने कभी शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया था। रस, छंद, अलंकार और प्रतीक का उन्हे ज्ञान नहीं था। किन्तु उनके पास व्यापक जीवन अनुभव था जिसके बल पर उन्होने एक ऐसे काव्य की रचना की जो सिर्फ भाव और विचार ही नहीं बल्कि काव्य सौन्दर्य की दृष्टि से भी उन्नत है।

मौलिक चिंतन, भाषा पर जबर्दस्त अधिकार और प्रभावशाली ढंग से अपनी बात कहने की योग्यता कबीरदास को दूसरे सभी कवियों से अलग और अद्वितीय बनाती है।

कबीरदास की काव्य भाषा को “सधुक्कड़ी” के नाम से जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी भाषा में किसी एक बोली का प्रभाव ना होकर कई बोलियों का प्रभाव विद्यमान है।

कबीरदास की काव्य भाषा में हिन्दी, उर्दू, राजस्थानी, पंजाबी, अवधी, भोजपुरी जैसी भाषाओं और बोलियों का प्रभाव स्पष्ट देखने को मिलता है। वैसे कबीर ने एक स्थान पर अपनी मातृभाषा को पूर्वी हिन्दी बताया है। कभी-कभी उनके पदों में खड़ी बोली के भी उदाहरण देखने को मिल जाते हैं।

कबीर की भाषा शैली की एक विशेषता है उनमें व्यंग्य और तीखापन का होना। जब भी कबीर ने सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों की निंदा की है तो उनकी भाषा में व्यंग्य और तिरस्कार स्वभावतः आ गया है:

केसो कहा बिगाड़िया, जै मुंडे सौ बार।                                                                                                            मन को काहे न मुंडिए, जामै विषय विकार।।

अपने काव्य में कबीरदास ने मूर्तिपूजा पर भी व्यंग्य किया है। किन्तु जब कबीर भक्ति और ज्ञान संबंधी पदों की रचना करते हैं तो व्यंग्य और कठोरता के स्थान पर सरल हृदय और भक्त मन के दर्शन होते हैं।

कबीर की भाषा शैली का एक रूप उलटबांसियों में मिलता है। उलटबांसियों में कबीरदास ने अपनी बात में छुपे रहस्यों को उलट-पुलट कर पेश किया है। हालांकि कबीर की भाषा सरल और सीधी है जो सीधे रूप से साधारण जनमानस के हृदय पर असर करती है।

आध्यात्मिक रहस्यों और योग साधना के अर्थों को सही से समझाने के लिए कबीर के काव्य में रूपक, संकेत और प्रटीक सहज ही चले आते हैं। इनसे उनके काव्य की शोभा और बढ़ जाती है। कबीर के साखी संग्रह में दोहा छंद का प्रयोग हुआ है तो रमैनी में दोहा और चौपाई छंद का इस्तेमाल देखने को मिलता है।

कबीर का सबद संग्रह अलग-अलग रागों पर आधारित गेय पद हैं। जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि कबीर अनपढ़ थे इसलिए उनके काव्य पदों में किसी शास्त्रीय नियम का पालन नहीं हुआ है। कबीर ने ब्रह्म या ईश्वर के प्रेम के लिए पति-पत्नी के रूपक का इस्तेमाल किया है। उनके काव्य में हठयोग के प्रतीक भी बहुत सरलता से इस्तेमाल किए गए हैं।

जब हम कबीर काव्य की भाषा शैली की बात करते हैं तो एक बात जाननी जरूरी है और वह यह कि कबीर ने काव्य चमत्कार उत्पन्न करने के लिए काव्य की रचना नहीं की।

संत कबीरदास जी के कुछ प्रसिद्ध दोहे

कबीरदास के संग्रह बीजक में एक से बढ़कर के दोहे मौजूद हैं। वे बड़ी चतुराई से अपनी बात कह देते हैं। उनकी वाणी रहस्यों और नाथ-पंथी योगियों की शब्दावली से भरी पड़ी है। आइए कबीरदास के कुछ प्रसिद्ध दोहों पर नजर डालते हैं:

जल में कुम्भ कुम्भ में जल है बाहरि भीतरि पानी।                                                                                  

फूटा कुम्भ जल जलही समाना यहु तत कथौ गियानी।।

कांकर पत्थर जोरि कै मस्जिद लई चुनाय।                                                                                            

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बाहिरा हुआ खुदाय ||

पाहन पूजै हरि मिले, तो मै पूजूँ पहार।                                                                                                       ताते यह चक्की भली, पीस खाये संसार।।

सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार।                                                                                        लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखा वणहार।।

तूँ तूँ करता तू भया, मुझ में रही न हूँ।                                                                                                          बारी फेरि बलि गई, जित देखों तित तूँ।।

कबीरा खड़ा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ।                                                                                                     जो घर जारे आफ्ना चले हमारे साथ।।

सुखिया सब संसार, खावे और सोवे।

                                                                                            दुखिया दास कबीर जागे और रोवे ||

कबीरदास की एक विशेषता उलटबाँसी के माध्यम से रहस्यों को पेश करने की भी है। उलटबाँसी का एक उदाहरण देखिये:

अवधू गगनमंडल धर कीजै।   

                                                                                           अमृत  झरे सदा सुख उपजै बंकनालि रस पीवै।।

कबीरदास का जीवन आज के लोगों के लिए भी प्रेरणादायक बना हुआ है। हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के धर्म संबन्धित आडंबरों की कड़ी आलोचना करने वाले कबीरदास ईश्वर के प्रति गहरे प्रेम को ही भक्ति के लिए आवश्यक मानते थे।

कबीर एक रहस्यवादी भक्त कवि थे जिनका रहस्यवाद साधनात्मक और भावनात्मक दोनों है। अपने साहित्य में उन्होने रूपकों और प्रतीकों के माध्यम से समाज सुधारने की कोशिश की है। कबीर ने केवल मुक्तक काव्य की रचना की है। आज जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसी कुरीतियों से बचने के लिए कबीरदास जैसे व्यक्तित्व की जरूरत है।

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