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एकादशी कब है?

एकादशी कब है?

एकादशी कब है? एकादशी का व्रत हिन्दू धर्म के प्रमुख व्रतों में से एक माना जाता है। यह व्रत महान पुण्य देने वाला और सभी पापों का नाश करने वाला है। एकादशी का व्रत एक महीने में दो बार पड़ता है।

जो लोग श्रद्धापूर्वक एकादशी व्रत का उपवास और रात्रि जागरण करते हैं उन्हे धन, धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है। एकादशी कब है और 2022-2023 में एकादशी कब है इसका विवरण यहाँ दिया गया है।

एकादशी व्रत क्या है?

एकादशी व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए माह की एकादशी के दिन किया जाने वाला उपवास है। एकादशी की रात में जागरण करने का भी विधान है। यह व्रत महीने के दोनों पक्षों शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है।

वर्ष के 12 महीनों में 24 एकादशी होती हैं। जिस वर्ष में एक अतिरिक्त मास होता है उसमें दो एकादशी अतिरिक्त बढ़ जाती हैं और कुल मिलाकर 26 हो जाती हैं।

इनके नाम हैं-उत्पन्ना, मोक्षदा, सफला, पुत्रदा, षटतिला, जया-विजया, आमलकी, पाप मोचनी, कामदा, वरूथनी, मोहिनी, अपरा, निर्जला, योगिनी, देव शयनी, पवित्रदा, पुत्रदा:, प्रबोधनी, पद्मा, इन्दिरा, पाशांकुशा, रंभा, और देवोत्थानी एकादशी।

यदि अधिक मास हो तो उनकी एकादशी के नाम पद्मिनी और परमा है। इन एकादशियों के जैसे नाम हैं वैसे ही गुण भी हैं। श्री हरी भगवान विष्णु के अंग से उत्पन्न होने के कारण पहली एकादशी उत्पन्ना कहलाती है। 

एकादशी की उत्पत्ति कैसे हुई?

एकादशी तिथि स्वयं भगवान विशु के शरीर से उत्पन्न हुई है जिसने दैत्यराज मूर का अंत किया था। राक्षस मूर का अंत करने के कारण भगवान विष्णु ने कन्यारूपी एकादशी को वर दिया कि एकादशी सब तीर्थों में प्रधान, समस्त विघ्नों का नाश करने वाली, तथा सब प्रकार की सिद्धि देने वाली होगी।

निर्जला एकादशी

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है उसे निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। सूर्य जब वृषराशि पर हों अथवा मिथुन राशि पर तब ज्येष्ठ मास में निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है।

निर्जला एकादशी के दिन मनुष्य को भोजन एवं जल दोनों का त्याग करना चाहिए तभी व्रत पूर्ण माना जाता है। इस एकादशी का व्रत सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक किया जाता है।

वर्ष में जितनी भी एकादशी होती हैं उनका फल सिर्फ इस निर्जला एकादशी के उपवास से मनुष्य प्राप्त कर लेता है। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं क्योंकि महर्षि वेदव्यास के कथानुसार पांडव पुत्र भीम ने इसका व्रत किया था।

निर्जला एकादशी कब है 2023-31 मई 2023 बुधवार                                                                                निर्जला एकादशी 2023 पारण मुहूर्त– 05:23:39 से 08:09:45 तक 1, जून को

आषाढ़ी एकादशी

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को शयनी या आषाढ़ी एकादशी कहते हैं। इसे हरिशयनी या देवशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि जगत का पालन करने वाले भगवान विष्णु इसी दिन से चार माह के लिए शयन करने चले जाते हैं।

आषाढ़ी एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी या हरि बोधिनी एकादशी तक भगवान का शयन होता है। अँग्रेजी कलेंडर के हिसाब से आषाढ़ी एकादशी हर वर्ष जून या जुलाई महीने में पड़ती है।

हरि शयनी एकादशी के दिन उपवास कर के भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। इसी दिन से चौमास या चातुर्मास का आरंभ माना जाता है।

2022 में आषाढ़ी एकादशी का व्रत 10 जुलाई के दिन रखा गया था। 2023 में आषाढ़ी एकादशी का व्रत 29 जून को रखा जाएगा।

आषाढ़ी एकादशी कब है 2023-29 जून 2023 गुरुवार                                                                                आषाढ़ी एकादशी 2023 पारण मुहूर्त– 13:48:15 से 16:35:37 तक 30, जून को

देवउठनी एकादशी

कार्तिक शुक्ल पक्ष में जो एकादशी पड़ती है उसे प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान जनार्दन श्री हरि विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं।

कार्तिक मास में भगवान विष्णु की प्रबोधिनी तिथि का एक ही व्रत कर लेने से मनुष्य हजारों जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। कार्तिक शुल्क पक्ष की एकादशी को हरिबोधनी एकादशी और देवोत्थान एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। 2022 में देवोत्थान एकादशी का व्रत 4 नवम्बर के दिन रखा जाएगा। 

भगवान विष्णु आषाढ़ माह की देवशयनी एकादशी के दिन योगनिद्रा में चले जाते हैं। वे लगभग चार महीने बाद कार्तिक मास के शुल्क पक्ष में एकादशी के दिन पुनः लोककल्याण के लिए जागते हैं। श्री हरि विष्णु के जगाने के बाद ही हिन्दू धर्म में शुभ और मांगलिक कार्य शुरू होते हैं।

इस चार माह की अवधि को ही चातुर्मास कहा जाता है। भगवान विष्णु के जगाने के अगले ही दिन शालिग्राम के रूप में श्री विष्णु एवं तुलसी विवाह सम्पन्न कराया जाता है।

देवउठनी एकादशी का महत्व

हरि प्रबोधनी या देवउठनी एकादशी के महत्व के बारे में विधाता ब्रह्मा ने स्वयं अपने मानस पुत्र नारद को बताया है। ब्रह्मा जी के अनुसार जो मनुष्य प्रबोधिनी एकादशी का नियमानुसार व्रत करता है उसे हज़ार अश्वमेध एवं सौ राजसूय यज्ञों का फल मिलता है।  

  • मेरु पर्वत के समान बड़े-बड़े पापों को भी ये पापनाशिनी प्रबोधिनी एकादशी एक ही उपवास में भस्म कर देती है।
  • देवउठनी एकादशी के व्रत से मनुष्य को संपत्ति, ऐश्वर्य, विवेक, बुद्धि, सुख, राज्य, और धन की प्राप्ति स्वतः हो जाती है।
  • इस एकादशी का उपवास और रात्रि जागरण मनुष्य के हज़ारों जन्मों के पापों को रुई की धेरै के समान भस्म कर देती है।
  • हरि-प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने वाले मनुष्य के पीटर नरक के दुखों से छुटकारा पाकर विष्णु लोक की प्राप्ति करते हैं।
  • तीनों लोकों में जो भी तीर्थ स्थित हैं वे सब प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने वाले मनुष्य के घर में स्थित रहते हैं।

2022 में देवउठनी एकादशी कब है

4 नवम्बर 2022, शुक्रवार                                                                              

  देवउठनी एकादशी 2022 पारण मुहूर्त

06:35:38 से 08:47:12 तक 5, नवंबर को

एकादशी व्रत 2022 तिथियाँ

2022 में एकादशी कब है आइए जान लेते हैं।

2022 एकादशी व्रत की तिथियाँ-Ekadashi 2022 List

दिनांक             दिन      एकादशी

13 जनवरी         गुरुवार  पुत्रदा एकादशी

28 जनवरी         शुक्रवार षटतिला एकादशी

12 फरवरी         शनिवार जया एकादशी

27 फरवरी         रविवार  विजया एकादशी

14 मार्च             सोमवार आमलकी एकादशी

28 मार्च             सोमवार पापमोचिनी एकादशी

12 अप्रैल           मंगलवार  कामदा एकादशी

26 अप्रैल           मंगलवार  वरुथिनी एकादशी

12 मई               गुरुवार  मोहिनी एकादशी

26 मई              गुरुवार   अपरा एकादशी

11 जून             शनिवार  निर्जला एकादशी

24 जून             शुक्रवार  योगिनी एकादशी

10 जुलाई           रविवार  देवशयनी एकादशी

24 जुलाई           रविवार  कामिका एकादशी

08 अगस्त          सोमवार पुत्रदा एकादशी

23 अगस्त          मंगलवार  अजा एकादशी

06 सितंबर         मंगलवार  पद्मा एकादशी

21 सितंबर         बुधवार   इन्दिरा एकादशी

06 अक्तूबर        गुरुवार  पापांकुशा एकादशी

21 अक्तूबर        शुक्रवार रमा एकादशी

04 नवंबर           शुक्रवार देवोत्थान एकादशी

20 नवंबर           रविवार  उत्पन्ना एकादशी

03 दिसंबर         शनिवार मोक्षदा एकादशी

19 दिसंबर         सोमवार सफला एकादशी

एकादशी का व्रत करने वाले भक्तों को हमेशा द्वादशीयुक्त एकादशी के दिन ही उपवास करना चाहिए। जो कलियुग में भक्तिपूर्वक एकादशी का व्रत करते हैं उनकी सभी कामनाएँ पूरी हो जाती हैं।

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