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अहिंसा क्या है ?

अहिंसा मूल शब्द हिंसा के विपरीत शब्द है | हिंसा का अर्थ किसी भी प्राणी या जीव को कष्ट या हानि पहुंचाने से है | इसके विपरीत अहिंसा सभी जीवन के प्रति किसी भी प्रकार की हिंसा पर रोक लगाता है | पतंजलि के योगसूत्र में अहिंसा एक महत्वपूर्ण यम है | अहिंसा को सभी धर्मो में श्रेष्ठ माना गया है | कहा भी गया है अहिंसा परमो धर्म: | अहिंसा नैतिक गुणों में सर्वोच्च है | इतना ही नहीं अहिंसा को सर्वोच्च सत्य भी माना गया है | अहिंसा का इतना महत्त्व है की माना जाता है की इसके पालनकर्ता को मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है | अहिंसा के सही पालनकर्ता को जीवन -मृत्यु के चक्र से मुक्ति संभव है |

दुनिया के सभी धर्मो में अहिंसा का पालन मानव का परम कर्तव्य माना गया है | सभी धर्मो के मूल स्वरुप में हिंसा का कोई स्थान नहीं है | लेकिन बाद में लोगो ने अपने हिसाब से अहिंसा के मूल स्वरुप को ही परिवर्तित कर दिया | हिन्दू धर्म के तहत ऋग्वैदिक काल में ‘बलि ‘ का अर्थ जौ , अनाज , शाक -सब्ज़ी इत्यादि का ईश्वर को अर्पण था | लेकिन यही कालांतर में बलि के नाम पर निरीह पशुओं का वध होने लगा | बलि की यह ग़लत परम्परा आज तक कायम है |
भगवान् महावीर ने अहिंसा पर जितना जोर दिया शायद विश्व में किसी अन्य ने नहीं | बौद्ध धर्म में अहिंसा को एक प्रमुख शील आचरण माना गया | बौद्ध धर्म मानता है की हिंसा या अहिंसा का आचरण व्यक्ति के कर्म के प्रभाव के रूप में भोगना पड़ता है | इतना ही नहीं हिंसा या अहिंसा का आचरण मनुष्य के पुनर्जन्म का कारण एवं निर्धारक बनता है |

आधुनिक जीवन में महात्मा गाँधी ने राजनीतिक जीवन में अहिंसा का व्यापक प्रयोग किया | सत्य एवं अहिंसा के प्रयोग ने न केवल महात्मा गाँधी के व्यक्तिगत जीवन को बल्कि भारतीय इतिहास में भी एक नए युग का आरम्भ किया | गाँधी की अहिंसा केवल भौतिक कर्मो तक सीमित नहीं थी बल्कि मन एवं विचारो के स्तर पर अहिंसा के पालन पर थी | मन में उठ रहा बुरा विचार ,क्रोध,ईष्या , द्वेष इत्यादि प्रकार की मानसिक हिंसा है |

अहिंसा का महत्त्व है किहम इस ब्रह्माण्ड में पृथक नहीं है , बल्कि सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए है | जीवन का जो नियम है वह सार्वत्रिक है और सभी उससे बंधे है | जीवन का नियम और सूत्र सभी पर लागू है | सृष्टि के कुछ नियम है जो सृजन की प्रक्रिया करते है | उन्ही नियमो से हमारा अस्तित्व है | इसीलिए जब हम कोई हिंसा करते है तो यह सीधा उस सृजन के नियम के विरूद्ध होता है | सृजन और विनाश का यह नियम सार्वत्रिक होता है और एकसमान रूप से हम सभी पर लागु होता है | यही सार्वत्रिक धर्म है | इसे ही बुद्ध ने ‘धम्म’ कहा था | अहिंसा का पालन आसान नहीं होता जबकि हिंसा आसान है क्योंकि यह क्रिया के विरुद्ध तुरंत प्रतिक्रिया देता है | अहिंसा में व्यक्ति को अपने मन,विचारो और कर्म पर नियंत्रण करना होता है ,जो कठिन है | अहिंसा के पालन करनेवाले को असीम धैर्य की जरुरत होती है | आधुनिक काल में गाँधी जी के अहिंसा का पालन करना और भी कठिन था | अंग्रेज लाठियां बरसाते रहते लेकिन सत्याग्रही अहिंसक बने रहते | इस तरह का अहिंसक आचरण सामान्य लोगों से संभव नहीं है |

वर्तमान में विश्व की अधिकांश हिंसक घटनाएं हमारे प्रतिक्रियावादी व्यहार का परिणाम है | जब भी जीवन में कोई थोड़ी भी विषम परिस्थिति होती है , हम गुस्से और क्रोध पर काबू नहीं रख पाते है | एक छोटी सी घटना पर हम अपने बुद्धि , विवेक को खो देते है | हमारी मानवता या इंसानियत जैसे ख़त्म सी हो जाती है | हम पशुवत हिंसा पर उतारू हो जाते है | बुद्धि और विवेक के गुण के कारण ही सृजन की प्रक्रिया में मानव सर्वोच्च स्तर पर विद्यमान है | यदि हम पशुवत हिंसा करते है तो पशु एवं मनुष्य में कोई भेद नहीं रह जाता है |

अहिंसा का अर्थ केवल भौतिक नहीं बल्कि विचार और भावनाओ के स्तर पर भी इसका पालन जरुरी है | यह सबसे गूढ़ बात जाननी जरुरी है | हम सोचते है की केवल शरीर से कोई हिंसा नहीं किया तो धर्म का पालन हो गया | लेकिन मन और विचारों में किसी के प्रति गाली ,अपशब्द,अहित या बुरे विचार लगातार सोचे जा रहे है | अगर ऐसा हो रहा है तो सचेत हो जाइये क्योकि यह भी एक प्रकार की हिंसा ही है | यह हिंसा भी बुरे कर्म जैसा ही प्रभाव लाती है | इसीलिए हमें अपने मन के अंदर चल रहे इन विचारो के प्रति हमेशा जागरूक रहना चाहिए |

courtesy: Google images

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